Domain Registration ID: D414400000002908407-IN Editor - vinayak Ashok Jain (Luniya) 8109913008
admin April 22, 2020

अमित जैन (सह-संपादक, बेंगलुरु) करोना के कारण उत्पन्न हुए आर्थिक संकट से निपटने के लिए कुछ क्षेत्रों में आंशिक छूट देने का मसौदा तैयार किया जा रहा है सबसे ज़्यादा इसमें से चर्चित क्षेत्र है ई-कॉमर्स में ग़ैर आवश्यक वस्तुओं का सक्रिय विक्रय है ।जिसका फ़ायदा सीधे तौर पर भारतीय बाज़ार में मुख्य रूप से सक्रिय दो या तीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को होना है । ये तो एक प्रकार से अर्थव्यवस्था के लिए सीधे तौर पर प्राणघातक होगा । यदि सोशल डिस्टेंसींग के नाम पर यदि इन कंपनियों को ग़ैर आवश्यक वस्तुओं को बेचने की अनुमति दे दी गई तो पहले से ही अधमरे हुए मध्यमवर्गीय व्यापारी वर्ग को यह निर्णय शव शया पर ला देगा।
इसके आर्थिक परिणाम बहूत ही भयंकर होंगे। इस बात से हम सब सहमत है कि आर्थिक लेन देन को काफ़ी समय तक रोक कर नहीं रखा जा सकता। परंतु यह निर्णय अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती ही होगा। सरकारी वित्तीय क्षेत्र में कार्यरत विभागों को इससे होने वाले सूक्ष्म प्रभावों का अध्ययन करना काफ़ी ज़रूरी है।
यदि व्यापारी आर्थिक संकट से गुज़रेगा तो वो बैंकों से लिया हर प्रकार के लोन नहीं चूका पाएगा। यहाँ तक कि अपने अपने यहाँ कार्यरत कर्मचारी को भी वेतन नहीं दे पाएगा इससे बेरोज़गारी भी बढ़ेगी। और अंततः वह शायद अपने स्वाभिमान की भी रक्षा न कर पाये। इसका एक कैसकेडिंग इफैक्ट होगा जिसका वित्त विभाग से जुड़े लोगों को कोई भी निर्णय लेने से पहले सोचना चाहिए। क्या सरकार इतने सारे बैड लोन के लिए प्रोविज़न रखने के लिए तैयार है।
इस बात से कोई भी इनकार नहीं करेगा कि करोना वायरस के प्रभाव के कारण आने वाले दिनों में भी बाज़ार में रौनक कम रहेगी और स्वाभाविक है कि इस समय ऑनलाइन व्यापार को बढ़ावा देने पर ही अर्थव्यवस्था की गति बढ़ सकती है। सरकार के लिए यह एक दुविधा है। तो इसका क्या उपाय होना चाहिए मेरे मत से सरकार को ख़ुद दुकानदार या व्यापारी और ग्राहक के बीच की कड़ी का कार्य करना पड़ेगा। सरकारी डाकघरों को सप्लाई चेन का हिस्सा बनाना होगा और सॉ़फ्टवेयर की मदद से व्यापारी और ग्राहक को जोड़ना होगा इससे एक विन -विन सिचुएशन क्रिएट होगी और इससे सभी लाभान्वित होंगे।
दूसरी ओर देश के विभिन्न व्यापारी संगठन और दुकानदार यदि साथ आ जाए तो बड़ी से बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी इस एकता के सामने घुटने टेक देगी। सभी संगठन एक साथ आकर सप्लाई चैन का एक अभेद्य क़िला बना सकते हैं। यदि ख़रीदारी भी ऑनलाइन हो तो वह भी स्थानीय दुकान से और ग्राहक को दुकान चुनने का भी अधिकार हो इससे सभी के हितों की रक्षा हो सकती है और एक स्वस्थ पारस्परिक प्रतिस्पर्धा भी होगी। इसके लिए न्यूनतम मूल्य पर एक वेबसाइट बनायी जाए जहाँ भारत के सभी छोटे बड़े व्यापारी जुड़े हो और उसका संचालन इस प्रकार से हो की यदि कोई ग्राहक किसी वस्तु को ख़रीदने के लिए अपने पते का पिन कोड डालें तो उसके आस पास वाले दुकान वाले देखें और उसमें से किसी एक को वह उस वस्तु का ऑर्डर दे दे। स्टॉक रहने की स्थिति में वह दुकानदार ग्राहक को सीधे दिलेवरी कर दे और न होने पर पहले से वेबसाइट पर रजिस्टर व्यापारी से सामान ले ले और यदि उस व्यापारी के पास भी यह न हो तो वह अपने से बड़े व्यापारी से ख़रीद कर अब तक ग्राहक तक वस्तु पहुँचा है इस तरह व्यापार का एक चेन राष्ट्रीय लेवल पर चलता रहे। इससे व्यापार की शृंखला बनी रहेगी और सभी का फ़ायदा होगा। इस करोना की मार के बाद यदि थोड़ा सा स्स्वार्थ छोड़ व्यापारीकरण साथ हो जाए तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने अनुभव के आधार पर पानी पिला सकते हैं। इससे हो सकता है मुनाफ़ा कम हो पर व्यापारीगण इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगे घुटने टेकने से बच जाएगे। शायद ये सुझाव विचारणीय हैं।

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