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आत्मा का ध्यान और परिग्रह का साथ दोनों ऐक साथ नही हो सकता:आचार्य उदारसागर

विदिशा से संभाग हेड शोभित जैन की रिपोर्ट

सच्चा गुरू कौन? पर प्रकाश डालते हुये आचार्य श्री उदार सागर जी महाराज ने मूलाचार के माध्यम से चार विशेषता को बतलाते हुये कहा कि परिग्रह का त्यागी हो, केस लोंच करने वाला हो, शरीर संस्कार से रहित हो एवं मयूर पिच्छिका धारक हो ऐसा वह जिनेन्द्र भगवान का स्वरूप अर्थात मुनि मुद्रा का धारक हो ऐसे गुरु की आराधना, श्रद्धा और समर्पण का भाव एक सम्यक् दृष्टी जीव का होता हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि आत्मा का ध्यान और परिग्रह का साथ दोनों ऐक साथ नही हो सकता। उन्होंने कहा कि सूई की छेद में से ऊंट तो कदाचित निकल सकता हैं लेकिन एक परिग्रही व्यक्ती को आत्मा का ध्यान नही हो सकता।
उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वाचार्यों को जिनको ज्ञात था कि उनको इसी भव से मोक्ष जाना हैं, वह चाहते तो ऐशोआराम की जिंदगी जीते, लेकिन नही वह जानते थे कि परिग्रह के साथ मोक्ष को प्राप्त नही हो सकते। इसलिये उन्होंने अचेलक वनकर मोक्षपद को प्राप्त किया।
आचार्य श्री ने कहा कि यह उन्मार्ग का नही सनमार्ग का मार्ग हैं। नग्नता ही मोक्ष मार्ग हैं
मात्र शुद्धोषी, वुद्धोषी वोलने मात्र से आपको मोक्ष नही मिलेगा।
भले ही उस जीव ने तीर्थंकर पृकृति का बंध कर लिया हो लेकिन वह भी अपना परिग्रह का त्याग करते हैं।
निर्गन्थ मुद्रा ही पूज्यनीय हैं।
वस्त्राभूषण से युक्त व्यक्ती हमारा गुरु नही हैं।
उन्होंने कहा कि जब भी गुरू मिलेंगे तो वह परिग्रह से रहित होंना अनिवार्य हैं!
मुनि अपने हाथों से केश लोंच करते हैं, तो समझना उन्होंने शरीर और आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लिया हैं।उपरोक्त जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन ने दी।

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