Domain Regd. ID: D414400000 002908407-IN Editor - vinayak Ashok Jain (Luniya) 8109913008

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चइत में जइसे-जइसे सुरूज भगवान चटख होत जाले, ओइसे-ओइसे भोजपुरिया इलाका के दूगो गंध मदिया देला… आम के मोजरि आ महुआ के फूल के गमक से जइसे भोजपुरिया इलाका में महमहा जाला. आम के फेंड़ त अबहियों खूब भा, बाकिर महुआ कमतरा गइल बा. तीस-चालीस साल पहिले भोजपुरिया इलाका में भी ऊ बेयार बहलि सुरू हो गइल रहे, जवना में फेंड़-खूंट के बेंचल आ काटल जइसे सवख हो गइल रहे. उहे ऊ दौर रहे, जब भोजपुरिया समाज भी आधुनिकता की ओर आगे बढ़त रहे. माटी वाला खपरइल छवाइल घर जइसे पिछड़ापन के निसानी बनि गइल आ सिरमिट-गारा वाला ईंटा के घर के ओर भोजपुरिया समाज भी बढ़े लागल रहे. विकास के नाम पर ई बदलाव जब आवे लागल त सबसे बेसी नोकसान महुए के फेंड़ के पहुंचवलसि… गांवा-गाईं वन विभाग के दरोगा-सिपाही के मिलीभगत से महुआ, जामुन, बन जिलेबी, कोंइति, बड़हर आदि के फेंड़ काटाए लगले स. जब महुआ के फेंड़े ना रहिहें त मादक गंध त कम होखबे करी. ई बात आउर बा कि अबहियों झारखंड, छत्तीसगढ़ में बाकी भोजपुरिया समाज के तुलना में महुआ के फेंड़ ढेरे बाड़े स.महुआ भोजपुरिया समाज के इकोतंत्र के महत्वपूर्ण हिस्सा रहे. ओकर कई गो इस्तेमाल रहे. जइसे कांच महुआ के फूल के रस निकालि के ओकरा के आटा में मेरा के दूगो वेंजन त भोजपुरिया समाज के घर-घर में बनत रहे. पहिलका रहे लपसी आ दोसरका रहे पुआ. लपसी के माने ई समझीं कि बिना घीव में भूजल आटा के महुआ के मीठ रस मिलाके बनल हलुआ. एकरा गांवन में कांची भी कहल जाला.

कुछु घरन में त महुआ के रस से आटा के मीठ कढ़ी भी बनत रहे. ओह में आटा के महीन-महीन पारथी भी पकावल जात रहे. अब भोजपुरिया समाज एह सवाद के भूलि गइल बा.
भोजपुरिया लोकगीतन में महुआ बीनला के बहुते वर्णन बा-महुआ बीनन हम ना जाइबि हो रामा,
देवरू के संगिया..
कवनो महुआ होत भिनसारे चुएला ता कवनो घाम चढ़ला. हमनी के बचपन में आपाना बगइचा में दूनों तरह के महुआ देखले आ ओकर फूल के बिनले रहनी हा जा.महुआ के बीनि के ले आके सुखावल जात रहल हा. सुखल महुआ के फेरू मुंगरी से पिटाई होई आ ओकरा में से झाला निकालल जात रह हा. ओह में से एक-दू बोरा घर के खर्चा खातिर राखात रहल हा आ बाकिर बैपारी लोगन के बेचात रहल हा. हमनी के बचपन में फिक्स रहे कि ठीक बैसाखी सिराति के पहिले महुआ बेचाई आ ओकरा से मिलल पइसा हम भाई-बहिनि में बंटाई. ओहि पइसा से हमनीं के छितौनी के सिराती मेला जात रहनी हा जा.
सूखल महुआ के गरमी के दिन में खाए में इस्तेमाल ना होत रहे. काहें कि महुआ गरम होखेला. जब बाराखा बाजत रहे त महुआ बाखारि में से निकलात रहे. ओकर तब दूगो इस्तेमाल होत रहे. गाइ-गरू के खियावे के आ अपने खाए के. एहू में धेयान राखात रहे कि जवना के स्वाद तनी बढ़िया होत रहे, ऊ आदमी के खियावे-खाए के काम आवत रहे आ जवना के सवाद तनी ठीक ना रहे, ओकरा के गाइ-गोरू के खियावल जात रहे.

गाइ-गोरू के खियावे खातिर महुआ पहिले भेंवात रहे, फेरू ओकरा के भूसा में मिला के खियावल जात रहे. एह में एक बाति के धेयान राखात रहे. लगहरि आ गाभिन गाइ-भंइसि छोड़ि के सबके खियावल जात रहे.
एही तरह जब बूनी-बरखा तेज होत रहे त महुआ के खाए खातिर भेंवाई होत रहे. ओकर रस निकालि के ओह में आटा फेंटि के ओकर महुअरि यानी महुआ के पुआ छानाति रहे. जेकरा पसन आवे त कांचियो-लपसी बनत रहे.
महुआ भूंजि के भी बूंट-मटर के घुघुनि संगे खाइल जात रहे. पहिले जब धान खातिर लेव लागत रहल हा त आदमी-जन, बनिहार-हरवाह के पनिपियाव में इहे जात रहल हा.

महुआ बहुत पौष्टिक होला. ओकरा में एंटीबाटी, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट आ फाइबर खूब पावल जाला. पश्चिम बंगाल से सीपीएम के एगो सांसद रहली डॉक्टर चंद्रकला पांडे. दू मर्तबा राज्यसभा में रहली. उनुका डांड़, पीठि आ गोड़ के दरद जाते ना रहे. तमाम इलाज के बाद हारि के ऊ कवनो वैद से मिलली. ऊ उनुका के महुआ के भूनि के दूध में दू दाना खाए-पिए के कहले. एह से उनुकर दर्द दूर हो गइल त ऊ जब केहू से मिलसु त महुआ के गुणगान कइला से ना रूकत रहली.
महुआ से तो देसी शराबो बनेला. झारखंड आ छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज में ओकर बहुते महत्व बा.

भोजपुरी समाज के महुआ सौंदर्य आ शृंगार के भी जबरदस्त प्रतीक ह. एकर असर देखे होखि त भोजपुरी के आधुनिक कविता में देखल जा सकेला. भोजपुरी के मसहूर कवि रहनीं सरयू सिंह ‘सुंदर’. फेंड़ से चुअत महुआ के सौंदर्य पर उहां के इ रचना देखीं-
गंछिया से टप-टप महुआ चुएला
जइसे नयनवा से लोर.
महुआ के गंछिया मातल मलिनिया
मनवा में उठेला हिलोर..

देखीं कवि के उड़ान, महुआ के चुअल उहां के नायिका के आंखि से गिरत लोर नीयर लागता. महुआ का गांछी के कवि जी मातल जवानी से करतारे. अइसना में प्रेम के हिलोर ना उठी ता का होई.
महुआ में जवन नाशा होला, ओह से एगो विरही नायिका घबरातिया. काहें कि ओकरा डर बा कि महुआ के मादक गंध कहीं ओकरे के ना मतवाला बना दे आ ओह हालति में कहीं ऊ ऊंच-नींच ना कई बइठे, काहें कि पिया त दूर परदेस में बा. भोजपुरी कवि रिपुसूदन श्रीवास्तव जी के एह रचना में ई भाव देखीं,

मातल बा महुआवा, बाड़ा डर लागे.
एक त अकेल, दूजे निसइल का आगे..
भोजपुरी रचनाकारन के महुआ के मादकता बहुते प्रभावित कइले बा. मुक्तेश्वर तिवारी ‘चतुरी चाचा’ के एह रचना में देखीं,
रंगवा के पनिया में चुनरी रंगइली आ
सोनवा के पनिया में सरेहि.
महुआ मदन-रस टपकेला बगिया में,
मातल बसंतवा में देहि.

चतुरी चाचा कहतारे कि फागुन में देवर के रंग से चुनरी रंगा गइल बा, जबकि पाकत फसल से सरेहि के रंग सुनहरा हो गइल बा. एही बीच बगिया में महुआ चुअल सुरू हो गइल बा आ एह से बसंत ऋतु में देहि माति गइल बिया.
महुआ के मादक सौंदर्य के चित्रण भोजपुरी के रचनाकार जगन्नाथ के एह रचना के जिकिर कइला बिना पूरे ना हो सकेला. तनीं उहां के एह रचना पर धेयान दीहीं-
बिहंसे बसंती बहार हो फगुनवा जे आइल.
सिहरेले अमवा-महुआवा के गंछिया.
रसवा भिनल पोरे-पोर.
भोरे भिनुसहरा जे कुहुके कोइलिया,
बिरहा के उठेला हिलोर.

साफ बा कि महुआ भोजपुरिया समाज के ना सिर्फ जीवन के अंग रहल हा, बल्कि ऊ संस्कृति के भी अहम उपादान रहल हा. आजु पूरा दुनिया पर्यावरण बचावे खातिर चिंतित बिया. महुआ ओहू कसौटी पर खरा रहल हा. ओकर छतनार गांछि पथिक के छाया भी देत रहलि हा. आईं शपथ लीं जा कि जीवन आ भोजपुरिया संस्कृति के प्रतीक महुआ के जिंदा करेके कोशिश में हमनी के आपन सामर्थ्य भर हाथ बढ़ाइबि जा. (डिसक्लेमर- लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)



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