Domain Registration ID: D414400000002908407-IN Editor - vinayak Ashok Jain (Luniya) 8109913008
admin April 11, 2020

भाग रही इस ज़िन्दगी में,
अब शायद कुछ विराम आ गया है |
जाग रही सी इस ज़िन्दगी में,
अब शायद कुछ ख़्वाब आ गया है |
विकसित हो रहे इस दानव में भी,
अब शायद कुछ मानवता आ गयी है |
बिखरा हुआ जहान भी ,
अब तो शायद एक हो गया है |
आधुनिकता का डंका बजाने वाले भी
अब शायद परंपरामय हो गये है,
मैली गंगा-यमुना भी ,
अब निर्मल हो गयी है |
सोया हुआ हिमालय भी,
अब मदमस्त हो गया है |
निराश हो रही प्रकृति में भी,
अब कुछ आस आ गयी है |
आ रही इस आशा की किरणों को देख ,
मानवता में नव स्पन्दन हो रहा है |
लेकर श्वास विश्वास का ,
अब नव जीवन अवतरित हो रहा है |
करके इस विपदा (करोना ) का सामना ,
लगता है मानव शायद अब मानव हो रहा है |
मानवता का जय गोष ही अब ,
हमें फिर विजयी बनायेगा |
हमारा प्यारा भारत तभी तो,
फिर से ‘सच्चा’विश्व गुरू कहलायेगा |
-अमित जैन

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