admin April 11, 2020

ये आधुनिकता भी न जाने कौनसा रंग लाएगी
विश्व को न जाने किस महोत्सव की गिरा सुनाएगी
ये आधुनिकता भी……………..
तमहर दिनकर भी अब तो चुपके से निकलता है
शीतलता बरसाता चन्दा शरमा कर के चलता है
सब प्राकृतिक ,जब कृत्रिम होने लगता है
धरा पर मानव जीवन तब डगमग होने लगता है
देखना बाकी है अब, कब तक तू बच पाएगी
ये आधुनिकता भी ना जाने कौनसा रंग लाएगी।
जब जीवाणु- विषाणु द्वारा मानव पर त्रास छा जाता है
तब मानव को केवल इतिहास याद आ जाता है
जब उसको अपने बचने का कोई राह न मिलता है
तब वह स्वयं भी प्राकृतिक होकर चलता है
सत्य है ईश्वर भी, किन्तु विज्ञान जान बचाएगी ।
ये आधुनिकता भी ना जाने कौनसा रंग लाएगी।
सत्ता की आंखों में जब मद विकास का चढ़ता है
तब विकास की राहों में जाने कितनो का घर का उजड़ता है
विकसित होना चाहते सब है, किन्तु इस प्रकार नहीं
आमजन-किसान कुशल हो,दिखे न भेद-भाव कहीं
क्या ये विकास की तीव्र दौड़,प्रजातंत्र रख पाएगी।
ये आधुनिकता भी न जाने कौनसा रंग लाएगी।
निज विकास का स्वप्न जब मानव के नयनों में पलता है
तब ग्राम से शहर ही ओर मानव स्वतः ही निकलता है
सुनकर सबके कर्ण चकित हो,ये निज विकास की गाथा है
आधुनिकता बुलाती उसको, फिर प्रकृति से क्या नाता है
आधुनिकता ही जीवन भर तृष्णा बढ़ाती जाएगी।
ये आधुनिकता भी न जाने कौनसा रंग लाएगी।।
कवि- सिद्धांत शर्मा

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