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श्री आदिनाथ भगवान की भक्ती में बड़ा जैन मंदिर किलाअंदर का गूंज उठा आंगन

  • देवशास्त्र और गुरू की साक्षी में किया गया श्री भक्तामर महामंडल विधान एवं जबलपुर से पधारे प्रसिद्ध कवि राकेश जैन राकेन्दु ने प्रभु और गुरु की भक्ती में भक्तों को आनंद विभोर कर दिया
    विदिशा ः दि.जैन बड़ा मंदिर किला अंदर में संत शिरोमणि आचार्य गुरूदेव श्री विद्यासागरजी महाराज के आशीर्वाद से मुनि श्री समतासागर जी महाराज एवं ऐलक श्री निशचय सागर जी महाराज के सानिध्य में श्री भक्तामर महामंडल विधान का संगीतमय आयोजन बाल ब्र. दिलीप भैया के निर्देशन में संपन्न हुआ।समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया प्रातःकालीन वेला में भगवान श्री आदिनाथ स्वामी का अभिषेक एवं शांतिधारा कर गंधकुटी में विराजमान कर नित्य नियम पूजन के साथ विधान प्रारंभ किया गया। विधान के मध्य में जबलपुर से आऐ कवि राकेश जैन “राकेन्दु” ने गुरु भक्ती की रचनाओं को सुनाते हुये कहा “गुरुवर की वाणी सजोले जरा, फिर समागम मिले न मिले।
    “आओ गुरूवर को मन में विठालो जरा, क्या पता ये आलम मिले न मिले,भक्त तो भक्ती में डूवे हुऐ ही थे, लेकिन कवि महोदय की कविताओं ने गुरू की भक्ती में साक्षात चार चांद लगा दिये। इस अवसर पर मुनिराज सेवा समिति किलाअंदर ने कवि श्री राकेश जैन राकेन्दु और मुनि भक्त अविनाश जैन को राष्ट्रीय स्तर पर दि. जैन मुनि धर्म रक्षा समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता नियुक्त किये जाने पर सम्मानित किया। एवं शीतलधाम में बनने जा रहे सहस्त्र कूट जिनालय में मूर्ती स्थापित करने वाले मुनि भक्त रबी, प्रशांत देवल परिवार का सम्मान न्यास की ओर से न्यासी सदस्य अविनाश जैन ने किया। महिला मंडल किला अंदर ने भक्ती भाव के साथ भगवान श्री आदिनाथ स्वामी की भक्ती कर भक्ती भाव से अर्घ समर्पित किये। इस अवसर पर अंत में धूप के साथ अग्नी में आहुतियाँ प्रदान कर विधान का विसर्जन किया गया।
    इस अवसर पर मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने आशीर्वाद देते हुये कहा कि आप सभी लोग इसी प्रकार देव शास्त्र और गुरु की भक्ती करते रहो उन्होंने मुनिराज सेवा समिती के सभी कार्यकर्ताओं और किलाअंदर स्थित महिलामंडल एवं पाठशाला के बच्चों की तारीफ की और आशीर्वाद प्रदान किया। उन्होंने कहा कि”जब तक तत्व के वास्तविक स्वरुप का निर्णय नहीं होता तब तक यह प्राणी अज्ञानी ही माना जाता है, उन्होंने कहा कि अज्ञानता में जीने के लिये कोई पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता पुरुषार्थ तो ज्ञान के लिये ही करना पड़ता है।उन्होंने वच्चों से पूंछा कि वताओ कोई बालक फैल होंने के लिये पढ़ाई करता है क्या? तो वच्चों ने कहा नहीं… फिर उन्होंने पूंछा कि अच्छा वताओ गाय को रस्सी से वांधना है, तो गांठ आप किसमें लगाते है,गाय में या रस्सी में? उत्तर मिला रस्सी में.. अब वताओ कि गाय रस्सी से वंधी है या रस्सी गाय से वंधी है?यथार्थ में तो रस्सी रस्सीसे वंधी है, गाय तो उस रस्सी के वंधन में है। जैसे दूध में पानी डाल दिया तो वह पानी दूध के साथ घुलमिल जाता है, उसी प्रकार जीवात्मा का और शरीर का एक क्षेत्र वाही सम्वंध है, फिर उन्होंने पूंछा दूध में पानी कब से मिला? जब से जानवर के अंदर दूध वनना शुरु हुआ तभी से उसके अंदर जलांश है, दूध के अंदर से यदि उस जलांश को समाप्त करना है, तो उसको किसी वर्तन में रखकर गरम कर तपाना होगा। वर्तन हमारा उपादेय भले ही न हो लेकिन दूध को गरम करने के लिये तो वर्तन को गरम करना ही होगा,उसी प्रकार आत्मा तो अनादि से अशुद्ध है, शुद्ध करने के लिये इस शरीर रुपी पुदगल को वृत और उपवास के माध्यम से तपाना ही पड़ेगा।
    प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया मुनि श्री के प्रवचन प्रातःकालीन वेला में९ बजे से किलाअंदर स्थित बड़े जैन मंदिर में चल रहे है।

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