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बिहार में सत्ता का केन्द्रीकरण और मंत्री जनक राम की कहानी

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बिहार में कुछ ताकतवर मंत्रियों को छोड़ दिया जाए तो आज की तारीख में नीतीश सरकार के ज्यादातर मंत्री रबर स्टैंप हैं. उनके विभाग में अगर कोई प्रधान सचिव स्तर का बड़ा अधिकारी है तो वह उनसे अधिक ताकतवर है.

Source: News18 Bihar
Last updated on: February 15, 2021, 10:00 AM IST

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पिछले दिनों एक खबर के सिलसिले में मुझे बिहार के सचिवालय स्थित तीन विभागों में जाने का अवसर मिला. पंचायती राज विभाग, ग्रामीण विकास विभाग और जल जीवन हरियाली मिशन. इन तीनों विभागों में मैं कई-कई बार गया. मगर मुझे जिस जानकारी की जरूरत थी, उसे बताने वाला कोई अधिकारी वहां नहीं था. खास कर एक अधिकारी जो बारी-बारी से तीन दफ्तरों में बैठते हैं, वे तीनों में से किसी में नहीं मिले. हर बार कहा जाता कि सीएम के साथ मीटिंग में हैं या लंच पर गये हैं. बिहार के सचिवालयों में सचिवों के लिए लंच ब्रेक अमूमन एक बजे से 4 बजे तक हो जाता है. थोड़ा पहले निकलते हैं, खाने के बाद अफसर थोड़ा टहलते और आराम करते हैं. फिर लौट कर सचिवालय आते हैं.यह सब मैं इसलिए बता रहा हूं कि यह बिहार में सचिवालय के काम करने की परंपरा का नजारा है. मैं तो एक सामान्य पत्रकार हूं, जब कोई मंत्री भी बिहार में पदभार संभालने जाता है तो उसका स्वागत करने के लिए सचिवालय में सचिव तो क्या कोई अदना सा क्लर्क भी नहीं रहता. चपरासी के हाथों उसे गुलदस्ता देकर उसका स्वागत किया जाता है. कहानी बिहार में हाल ही में बनाये गये मंत्री जनक राम की है. आप में से कई लोग जानते होंगे, जो नहीं जानते वे जान लें कि जब वे अपने दफ्तर पहली दफा गये तो दफ्तर पूरा खाली था. वहां सिर्फ एक चपरासी था, जिसने गुलदस्ता देकर उनका स्वागत किया. बाद में विभाग की प्रधान सचिव हरजोत कौर ने कहा कि वे मुख्य सचिव के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में व्यस्त थीं, इसलिए नहीं आ सकीं. उन्हें मंत्री के आने की खबर नहीं थी.

मंत्री और सचिव के बीच तालमेल का अभाव

मौजूदा परिस्थितियों में उनका यह तर्क सही लगता है मगर जैसा कि मैं पहले बता चुका हूं, बिहार के सचिवालयों में यह आम दृश्य है. अनौपचारिक बातचीत में राज्य सरकार के कई मंत्री इस बात की शिकायत करते हैं कि उनके विभाग के सचिव उनकी बात नहीं सुनते हैं. हाल के दिनों में एक मंत्री ने नाम न छापे जाने की शर्त पर कहा था कि उनके विभाग के ज्यादातर महत्वपूर्ण फैसले तब होते हैं, जब वे किसी यात्रा पर होते हैं. तब उनकी गैरहाजिरी का तर्क देकर योजनाओं को एप्रूव करा लिया जाता है. एक मंत्री तमाम कोशिशों के बावजूद अपने विभाग का एक छोटा सा आयोजन अपने गृह क्षेत्र में नहीं करा पाये. एक अन्य मंत्री ने अनौपचारिक बातचीत में अपने ही विभाग के एक फैसले से ऐतराज जताया. जब मैंने पूछा कि आपने इसे क्यों लागू किया तो उन्होंने कहा कि यह तो सीएम ऑफिस से लागू हुआ, मेरे पास तो सचिव सिर्फ साइन कराने आये थे.दरअसल, वास्तविकता यह है कि कुछ ताकतवर मंत्रियों को छोड़ दिया जाये तो आज की तारीख में बिहार के ज्यादातर मंत्री रबर स्टैंप हैं. उनके विभाग में अगर कोई प्रधान सचिव स्तर का बड़ा अधिकारी है तो वह उनसे अधिक ताकतवर है. विभाग के तमाम फैसले सीएम कार्यालय या मुख्य सचिव के निर्देशन में लिये जाते हैं. कई बार तो उन फैसलों में मंत्रियों की सहमति तक नहीं होती. अब चूंकि ये मंत्री राजनीतिक रूप से मजबूत नहीं होते, उन्हें पद देकर उपकृत किया गया होता है, तो वे चुपचाप सिर्फ लाल बत्ती और कुछ फायदों के चक्कर में मौन रह जाते हैं.

मंत्रियों को स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार नहीं

मंत्री जनक राम के प्रकरण में बस उसी परंपरा का खुलासा हुआ है. तभी वे बिफर पड़े और 10 मिनट इंतजार करने के बाद मुझे अहसास हुआ कि विभाग में अफसरशाही हावी है. मगर वे यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाये कि यह अफसरशाही क्यों हावी है और इसे किसकी शह मिल रही है. दरअसल, बिहार के सत्ता तंत्र में अफसरशाही का हावी होना और मंत्रियों की उपेक्षा की वजह यह है कि मुख्यमंत्री राज्य के तमाम फैसले खुद लेना चाहते हैं. वे राजनीतिक कारणों से अपने मंत्रियों को इन फैसलों के प्रति कंविंस नहीं कर सकते तो वे सत्ता को अफसरों के जरिये कंट्रोल करते हैं.बिहार में लंबे समय से सीएम ऑफिस सत्ता का केंद्र है और यह बिहार में ही नहीं कई और जगहों पर है. लोकतंत्र में सत्ता का केंद्रीयकरण और एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द पावर का जमावड़ा आज की राजनीति का नया फैसन बन गया है. जिस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सत्ता के संचालन में एक-एक व्यक्ति की भूमिका सुनिश्चित करने की बात थी, उसमें अब पूरी सत्ता एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों तक सीमित रह गयी है. तय यह हुआ था कि गांव के मुखिया और सरंपच तक को अपने फैसले खुद लेने का हक होगा, यहां तो मंत्रियों तक के पास स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार नहीं हैं.

बीजेपी-जेडीयू की मौन सहमति

यह पूरी घटना लोकतांत्रिक परंपरा के क्षरण और उसके धीरे-धीरे व्यक्ति केंद्रित तानाशाही की तरफ बढ़ने के उदाहरण हैं. यह ठीक है कि मंत्रीमंडल का गठन मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है. वह विभिन्न विषयों पर बेहतर काम करने के लिए अपनी टीम बनाता है. मगर अपनी ही बनायी टीम को रबर स्टैंप बनाकर रख देना और उसके सारे फैसले उसके ही विभाग के अफसरों द्वारा खुद लेना लोकतंत्र के हित में नहीं. यह सवाल मंत्रियों के ईगो भर का नहीं है. यह सवाल लोकतंत्र का है.ये चीजें अब तक ढकी-छिपी रहीं, क्योंकि अब तक बिहार में भाजपा और जदयू के बीच बेहतर समन्वय था और दोनों पार्टियों द्वारा इस प्रक्रिया को मौन सहमति थी. मगर अब दोनों सत्ता में एक साथ रहते हुए एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में है. भाजपा छोटे भाई से बड़ा भाई बन चुकी है, तो ऐसी चीजें खुलकर सामने आ रही है. मगर इन बातों का खुलकर सामने आना, इस पर बहस होना जरूरी है. लोकतांत्रिक सत्ता में अफसरशाही का नियंत्रित होना और सत्ता का विकेंद्रीकरण होना भी ऐसी ही बहसों के जरिये मुमकिन होगा. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)


First published: February 15, 2021, 9:29 AM IST

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