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Jaywant Bherviya December 27, 2019


उदयपुर, /स्वीडिश फिल्ममेकर एना बोहलमार्क द्वारा भारतीय हाथियों और मानवीय संघर्ष के कारण अस्तित्व पर आए खतरे को रेखांकित करती ‘बिग सोशल नोमेड’ लघुफिल्म की स्क्रीनिंग गुरुवार को चेटक सर्कल स्थित वन भवन सभागार में की गई। इस दौरान बड़ी संख्या में वन विभागीय अधिकारियों के साथ प्रकृति व वन्यजीव प्रेमियों ने इस फिल्म का देखा तथा इसमें हाथियों के अस्तित्व पर आए खतरे को बेहद उमदा तरीके से उद्घाटित करने के प्रयासों की तारीफ की
सेवानिवृत्त मुख्य वन संरक्षक राहुल भटनागर, मुख्य वन संरक्षक बी. प्रवीण और आर.के.सिंह ने भी फिल्म की विषयवस्तु की सराहना की और एना को वागड़-मेवाड़ में पेंथर व मानवीय संघर्ष पर फिल्म बनाने का सुझाव दिया। एना ने इस पर विचार करने की बात कही। फिल्म स्क्रीनिंग दौरान सेवानिवृत्त डीएफओ प्रतापसिंह चुण्डावत व सोहेल मजबूर, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अरूण सोनी, वाईल्ड लाईफ फोटोग्राफर शरद अग्रवाल व देवेन्द्र श्रीमाली, रणमल झाला, पक्षीविद् विनय दवे सहित बड़ी संख्या में पर्यावरण व वन्यजीव प्रेमी मौजूद थे। उप वन संरक्षक अजय चित्तौड़ा ने फिल्ममेकर का परिचय के साथ सफल स्क्रीनिंग के लिए आभार जताया।    
मनुष्य से भी ज्यादा सामाजिक व संवेदनशील है हाथी: एना
फिल्म की स्क्रीनिंग दौरान अन्तर्राष्ट्रीय वाईल्डलाईफ फिल्ममेकर एना ने बताया कि ‘बिग सोशल नोमैड’ उन खतरों को प्रस्तुत करता है जो आज के आधुनिक भारत में हाथी सामना कर रहे हैं। फिल्म इस जटिल मुद्दे पर भी जानकारी देती है कि जमीन किसकी होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि भारत अपनी सभी बहुआयामी संस्कृति के साथ, आज जंगली हाथियों का केंद्र है। हालांकि उनके जीवित होने का खतरा स्पष्ट है तथापि स्थानीय मान्यताओं और संस्कृति के कारण इनके संरक्षण की भी संभावनाएं अपार हैं। उन्होंने बताया कि हाथी मनुष्य से भी ज्यादा सामाजिक और संवदेनशील प्राणी हैं और वे सिर्फ अपने बचाव में ही हमला करते हैं।
6 महिने में तैयार हुई फिल्म:
एना ने बताया कि यद्यपि स्वीडन में एक भी हाथी नहीं है तथापि वह भारत में हाथियों और मानवीय संघर्ष के कारण हाथियों की संख्या में लगातार हो रही कमी से प्रभावित होकर पेलीकन मीडिया के बैनर तले उसने यह भावुक फिल्म बनाई है। उन्होंने बताया कि नई दिल्ली में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के विवेक मेनन से मुलाकात के बाद दिसंबर 2018 में इस फिल्म की नींव पड़ी और मई 2019 में यह फिल्म तैयार हुई। इस अवधि में तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल में वन्यजीवों के आवास की शूटिंग की गई। उन्होंने बताया कि इससे पहले वह गोरिल्ला और पिग्मियों पर भी फिल्म बना चुकी है।  

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