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खोटा स्नेह और खोटा सिक्का कभी न कभी प्रगट हो ही जाया करता हैं:आचार्य उदारसागर

विदिशा से संभाग हेड शोभित जैन की रिपोर्ट

सामान्यतयः तो सभी को सामाजिक स्तर पर एक दूसरे से वात्सल्य का भाव रखना चाहिये, न कभी किसी से कोई अपेक्षा करो और न कभी किसी की उपेक्षा का भाव रखो, सौहार्दपूर्ण वातावरण रखकर एक दूसरे के प्रति सहयोग की भावना रखने से एवं स्वाभाविक रूप से स्नेह को प्रगट करने से ही वात्सल्य अंग प्रकट होता हैं।
वंही धर्मात्मा के प्रति विनय, भक्तीभाव और उनके प्रति यथायोग्य सम्मान तथा सेवा का भाव रखना आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी ने वात्सल्य अंग की उपमा दी हैं।
उपरोक्त उदगार आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज ने किरीमौहल्ला विदिशा स्थित जैनभवन में व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि जो धर्मात्मा पुरूष हैं उसकी यथायोग्य विनय ही धर्म है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में यह देखा जा रहा हैं कि हम अपनी मर्जी के मालिक हो गये हैं, किसी के प्रति इतना अतिरेक भाव होता हैं, कि उसकी वंहा पर आवश्यकता ही नहीं हैं, और किसी को जंहा पर उनको आदर और सम्मान दिया जाना चाहिये उनके प्रति अनादर का भाव नजर आता हैं।
उन्होंने कहा कि यदि भक्ती के अतिरेक में अयोग्य व्यक्ती को यदि योग्य कहोगे एवं उनका आदर और सम्मान करोगे तो यह आपका विवेक सून्य कहलाऐगा, और यदि आप किसी विनयवान धर्मात्मा व्यक्ती की योग्यता का उलंघन कर आप उनका अनादर कर रहे हो तो वह वात्सल्य अंग का उलंघन कहलाऐगा।
आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी कहते है कि कर्तव्य में हीनता और अतिरेक दोनों का ही भाव नही होंना चाहिये, जिसके प्रति विनय की जा रही हैं, उसका प्रसस्त भावों से होकर आदर और सत्कार होंना चाहिये। आपके मन में यदि खोटे परिणाम आऐंगे और यदि आप किसी से छल, कपट, और मायाचारी से प्रतिबद्ध होकर किसी की भक्ती कर रहे है, तो वह वात्सल्य अंग का पालन नही कर रहे हैं। एवं वह दुर्गति का कारण बनेगा।
ध्यान रखना खोटा स्नेह और खोटा सिक्का कभी न कभी प्रगट हो ही जाया करता हैं।
स्नेह यदि मायाचार सहित होगा तो वह आपके अंदर रह ही नही सकता वह फिर ऐसा प्रगट होता हैं जो इस जन्म में ही दुर्गति का कारण बन जाता हैं।
उन्होंने मायाचारी की एक घटना सुनाते हुये कहा कि दो महिलाएं देवरानी और जिठानी एक साथ रहा करती थी दोसक्सनों के बीच बड़ा प्रेम था उनके बीच में एक बेटा था लेकिन वह बेटा दोनों को ही मां कहता था।
किन्ही कारणों से देवरानी और जिठानी के बीच मतभेद हो गया और उनकी सम्पत्ति भी आधी आधी हो गयी।
बात उनके बेटे की आई तो बेटा तो दोनों को ही मां बोलता था। बडी़ ने उस बेटे पर अपना हक जमाया वंही छोटी भी अपना हक कंहा छोड़ने वाली थी। आखिर आपसी तू तू में में की यह घटना
राजा श्रोणिक के दरवार में पहुंचा दोनों माताओं ने अपना अपना हक पेश किया। राजा ने बेटे को बुलाया लेकिन बेटा तो दोनों को ही मां बोलता था।
कोई भी निर्ण्य न होंने की स्थिती उनके महामंत्री अभय कुमार ने दूसरे दिवस सभा बुलाने का निर्णय लिया।
दूसरे दिवस राज्य सभा लगी एवं दोनों माताओं को बुलाया गया एवं कहा गया कि जिसका बेटा है वह इस बेटे को ले जाऐ लेकिन दोनों ही अपना हक छोड़ने को राजी न हुई तो आदेश दिया गया कि जल्लाद बुलाकर इस बेटे के ऊपर से लेकर दो भागों में विभक्त कर दो और दोनों को बराबर का हिस्सा दे दिया जावे।
ये आदेश सुनकर छोटी मां घबड़ा गयी और बोली कि यह मेरा बेटा नही हैं, आप इसके दो टुकड़े मत करो आप इस बेटे को बड़ी मां को ही दे दो में अपना हक वापिस लेती हूं।
उक्त बात से महामंत्री अभय कुमार ने निर्णय लेते हुए कहा कि इस बच्चे की असली मां यही हैं, और वह बेटा छोटी को दे दिया जाता हैं।
उपरोक्त जानकारी श्री सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन विदिशा ने दी।

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