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बृह्म मुहूर्त में उठना, अतिथियों की सेवा में तत्पर रहना,तथा क्रोध के समय कोई भी निर्णय नहीं करना चाहिये:आचार्यश्री

विदिशा से संभाग हेड शोभित जैन की रिपोर्ट

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बृह्म मुहूर्त में उठना, अतिथियों की सेवा में तत्पर रहना,तथा क्रोध के समय कोई भी निर्णय नहीं करना चाहियेउपरोक्त उद्गार आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज ने प्रातःकालीन रविवारीय प्रवचन सभा को संबोधित करते हुये कहे।
उन्होंने सभा की शुरूआत एक प्रेरक कहानी से करते हुये कहा कि”एक सन्यासी ने राजा की दानवीरता को सुन रखा था,
वह उस राज्य में पहुंच गया और जोर जोर से आवाज लगाने लगा कि “एक लाख की एक बात और तीन लाख की तीन बात”
उस सन्यासी की बात को सुना तो कुछ लोगों ने उसे विक्षिप्त समझा तो कुछ लोगों ने उस बात को सुना अनसुना कर दिया।
(आचार्य श्री ने उपस्थित जन समुदाय से पूंछा क्या बात भी बिकती हें!)
हां भाई हां फोकट की बात मत करो
बात भी विकती हैं यदि नही बिकती होती तो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में वकील बातों के ही लाखों रूपये आपसे फीस के रुप में लेते हैं।और आप लोग देते हैं।
आखिर उस राज्य के राजा के पास भी उस सन्यासी की आवाज पहुंची उसने उस सन्यासी को राज दरबार में बुलाया और उससे कहा कि आप अपनी उन तीन बातों को हमें बताइये हम आपको तीन लाख रुपये देंगे। उस सन्यासी ने उन तीन बातों को बताते हुये कहा कि हे राजन यदि आप
ब्रह्म मुहर्त में उठेंगे और राज्य में आऐ हुये अतिथियों का सत्कार करेंगे तथा क्रोध के समय अपने आपको शांत रख बाद में कोई भी निर्णय करेंगे तो आपके ऊपर आई हुई विपत्ती भी टल जाएगी।
राजा ने सन्यासी की उक्त बातों को सुना और राज्यकोष से तीन लाख रुपये दैनै का आदेश कोषाध्यक्ष को दिया।
लेकिन उस सन्यासी ने उन रुपयों को लेेने से इंकार कर कहा कि हे राजन् मुझे कोई धन नही चाहिये में ठहरा सन्यासी मुझे धन से कोई लालसा नही हैं। हमने सुना हैं आप धर्मपालक हें उक्त बात आप तक पहुंचाना थी
कल आपके नगर में कुछ साधू यात्रा करते हुये आ रहे हैं उनके भोजन आदि की व्यवस्था करवा दीजिएगा इतना ही काफी हैं।
उसने दूसरे दिवस राज्य में आए हुये सभी साधुओं की आवभगत की एवं सभी साधुओं को विदा किया। एवं सन्यासी द्वारा कही उक्त तीनों बातों को अपने जेहन में अमल करते हुये प्रत्येक सुबह बृह्म मूहूर्त में उठने कर घूमने जाने लगा।
एक दिन प्रातःकालीन बेला में वह सुबह घूमने जा रहा था कि एक औरत की फूट फूट कर रोने की आवाज सुनी।
उस औरत से उसका परिचय पूंछा तो उस औरत ने अपना परिचय देते हुये बताया कि में भवितव्यता हूं! और मुझे इस बात का दुःख हैं कि कल इस राज्य के राजा की सर्पदंश से मृत्यू होंने वाली हैं!
राजा ने उस औरत की यह बात सुनी तो वह भयभीत नही हुआ बल्कि उसने उस सन्यासी को धन्यवाद दिया कि प्रातः उठने से उसे इस बात की जानकारी तो मिल गयी।और वह राजा अपने घर आकर साधू की दूसरी कही बात पर अतिथि देवो भवः पर विचार करता हैं कि कल प्रातः जो काला सर्प ऊंची पहाडी़ से राजमहल में आएगा वह भी तो एक अतिथी हैं, और हमे उसका सत्कार करना चाहिये।
भारतीय संस्कृति भी कहती हैं कि अतिथि दैवो भवः।
सौभाग्यशाली हैं वह लोग जिनके घर अतिथी आते हैं, और लोग उनका सत्कार किया करते हैं।
राजा ने आदेश दिया और उस काले नागराज का स्वागत करते हुये उसके गंतव्य स्थान से लेकर राजमहल तक सुगंधित फूल बिछवाकर स्थान स्थान पर दूध के कटोरे रख दिये गये। समय आया और वह काला सर्प पहाडी से नीचे उतरा सुगंधित द्रव्यों और रास्ते में बिछे फूलों का आनंद लेते हुये दूध पीने में ही उसका संपूर्ण समय निकल जाता हैं, एवं राजमहल आते आते सूर्य अस्त हो जाता हैं।
नागराज राजा के उस महल में आता हैं, और वह मनुष्य वाणी में कहता है हे राजन में आपके काल रूप में आया था लेकिन आपके अतिथि सत्कार से वहूत प्रसन्न हूं। आज आप जो कुछ मांगना हैं वह मांग लो।
राजन उसकी बात को सुनकर कहता हैं, कि आप हमारे अतिथी हैं आप जिस उस उद्देश्य से आऐ हैं आप अपना कार्य कीजिये!
लेकिन वह सर्प निष्प्राण हो अपने प्राणों का त्याग कर देता हैं।
इस प्रकार उस सन्यासी की दूसरी बात भी सिद्ध हो जाती हैं। और राजा के प्राणों की रक्षा हो प्रसन्न होकर अपनी रानी के महल की ओर चल देताहैं, महल में पहुंच वह क्या देखता हैं कि जिस रानी को वह बहूत चाहता था वह किसी पर पुरुष से लिपट रही हैं।और वह क्रोध में आकर तलवार निकाल लेता हैं, तभी उसे उस सन्यासी की कही तीसरी बात याद आ जाती हैं कि क्रोध के समय कोई भी निर्णय मत करना। और राजन अपनी तलवार को म्यान में रख शयनकक्ष में प्रवेश करता हैं, अपने पति को सकुशल आया देख रानी प्रसन्न होकर उसका स्वागत करते हुये बताती हैं हे राजन राजसी पुरुष वेश में यह आपकी ही पुत्री है, जिसको हमने आपकी अनुपस्थिति में राज्यशासन हेतू तैयार किया था। लेकिन आपके सकुशल आने से अब इसकी कोई आवशक्ता ही नही हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती हैं कि कितना भी संकट क्यूं न हो हमें धैर्यपूर्वक उस बात को सुनना चाहिये। प्रातःकालीन ब्रह्म मुहूर्त में उठना एवं अतिथिओं की सेवा एवं क्रोध के समय कोई भी निर्णय नही करना चाहिये।
यदि हम सभी लोग इस बात का ध्यान रखें तो जीवन में आए हुये संकटों से बचा जा सकता हैं।
इस अवसर पर मुनि श्री उपशांत सागर जी महाराज ने संबोधित करते हुये कहा कि
जंहा आस्था होती हैं, वंहा रास्ता भी मिल जाया करता हें।
उन्होंने कहा कि आस्था समीचीन होंना चाहिये, आस्था से ही संसार चलता हैं, और वही मुक्ती के द्वार भी खोलता हैं।
“आस्था का अर्थ है समर्पण” और यह समर्पण आपका किसी के प्रति भी हो सकता हें।
जब आप बीमार पड़ते हैं या किसी मुकदमे में फंसते हैं तो आपको समर्पण उस डाक्टर अथवा वकील पर करना पड़ता हैं,
उन्होने कहा कि सांसारिक कार्यों में आपकी आस्था कभी सड़क पर बैठे हुये आपके भविष्य को देखने वाले उन पशू पक्षियों पर भी हो जाती हैं, तो कभी सड़क पर बैठै भविष्यफल दिखाने वाले उन लोगों पर भी कर लेते हैं, जो आपको भविष्य के सपनों में झूले झुलाते हैं। लेकिन अपने उस गुरू पर अपने उस भगवान पर नही करते जो वास्तविक रूप से आपके जीवन का कल्याण करने वाले हैं।
उन्होंने कहा कि मुसीबत के समय ही आपको भगवान याद आते हैं,
ध्यान रखना यदि आपका अपने भगवान के ऊपर और अपने ऊपर दृण विश्वास हैं तो वह आने संकटों से भी पार हो जाया करता हैं।
उपरोक्त जानकारी सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुये बताया रविवारीय धर्म सभा में दीपप्रज्वलन भोपाल से आए हुये अतिथियों ने किया वंही आज बालिकाओं ने शास्त्र भेंट किये। कार्यक्रम का संचालन मुकेश जैन बड़ाघर ने एवं मंगलाचरण श्रीमति अंजना जैन ने किया।

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