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अहिंसा के सिद्धांत में जितना महत्व जिओ और जीने दो का है उतना व्यव्हारिकही महत्व जीवन में रहो और रहने दो का है: मुनि श्री समतासागर

विदिशा: प्रातःकालीन बेला में, मुनि श्री समतासागर जी महाराज एवं ऐलक श्री निश्चय सागर जी महाराज का मंगल प्रवेश ईदगाह चौराहे से मनोहर टांकीज गुलाव वाटिका डंडापुरा बड़ा बाजार निकासा माधवगंज से किरीमौहल्ला खरीफाटक रोड़ से अरहंत विहार स्थित जैन मंदिर पहुंचेंगे।
प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया सुक्रवार को सांची से चलकर रात्रीकालीन विश्राम विदिशा नगर से 4 कि. मी. पहले सागर बाईपास अग्रवाल अकादमी में हुआ।
शनिवार को प्रातःकालीन 7 बजे ईदगाह चौराहे से बिना गाजे बाजे के मंगल प्रवेश होगा।
वंही जैन समाज विदिशा का यह परम सौभाग्य हैं कि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के परम प्रभालक शिष्य मुनि श्री कुंथु सागर जी महाराज एवं ऐलक श्री सिद्धांत सागर जी महाराज ने राहत गड़ से विहार करते हुये शनिवार को ही प्रातःकालीन बेला में विदिशा नगर में ही सागर रोड़ से मंगल प्रवेश होंने जा रहा हैं। यह समाज का दौहरा सौभाग्य ही है, जो एक साथ दो मुनिसंघ के चरण इस पवित्र पावन नगरी में पड़ने जा रहे है।
बीस साल बाद मुनि श्री समतासागर जी एवं ऐलक श्री निश्चय सागर जी महाराज को निहारने के लिये, उनके स्वागत बंधन के लिये संपूर्ण विदिशा के धर्म पिपासु जनता आतुर है, वंही दूसरी ओर कोरोना महारोग से भी स्वं की एवं सभी की रक्षा भी करना हैं।
उपरोक्त संद्रभ में श्री सकल दि. जैन समाज एवं श्री शीतल विहार न्यास ने मुनिसेवक संघ, श्री विद्यासागर नवयुवक मंडल सहित सभी महिला मंडलों एवं विदिशा नगर की समाज एवं बाहर से आने वाले समस्त श्रद्धालुओं से अपील की है कि वह भीड़ न लगाए, अनुशासन का पालन करें। मुनिसंघ के साथ कोई भी श्रद्धालु नहीं चलेंगे। अपने अपने घरों से या सड़क के किनारे से ही शोसल डिस्टेंस और शासन के निर्देशानुसार नमोस्तु वंदना या आरती करेंगे। कोई भी पाद प्रछालन या चरण छूने के लिये आगे नही आएगा।
इस अवसर पर आज सांची में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुये मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा
“ऋतु और मौसम के अनुसार अषाढ़ का महिना चलता है, जैसे अषाढ के महिने में की गई महनत एक किसान के लिये वहूत महत्वपूर्ण होती है, जो कि उसके साल भर काम आती है, ठीक उसी तरह से धर्म के क्षेत्र में श्रद्धालुओं को अषाढ़ का महिना बहूत महत्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति स्वं ही साधना और शांतिप्रिय संस्कृति रही है। अषाढ़ का महिना और श्रावण में शास्त्रीय विधी विधान से साधू जन इन माहों पर विशेष ध्यान देते है, जिसका लाभ पूरी समाज को मिलता है।
उन्होंने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में घट रही घटनाओं का जिकर करते हुये कहा कि शांति प्रिय देश और शांतिप्रिय समाज कभी भी अतिक्रमण को पसंद नहीं करते लेकिन यदि कोई उन पर अतिक्रमण या आकृमण करे तो उस देश को अपनी सीमा की सुरक्षा के आवश्यक कदम भी उठाना पड़ते है।
“अहिंसा के सिद्धांत में जितना महत्व जिओ और जीने दो का है उतना ही महत्व व्यव्हारिक जीवन में रहो और रहने दो का है”

उन्होंने कहा कि विश्व में सभी राष्ट्र अपनी सीमाओं की सुरक्षा अपनी अपनी सीमाओ में रह कर करें।कोई भी किसी की सीमाओं पर अतिक्रमण न करे।उन्होंने अहिंसा को एक बहूत बड़ा शस्त्र वताते हुये एवं राष्ट्रीय भावनाओं के महत्व को दर्शाते हुये कहा कि राष्ट्र की सुरक्षा के लिये संत समाज भी निरंतर उन मंत्रों की जाप दे रहे है, जिससे संपूर्ण विश्व में शांति का वातावरण बना रहे। उन्होंने कहा कि आज
कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को परेशान किया है, इसलिये इस महामारी से छुटकारा पाने के लिये सभी को अपना अपना बचाव करना भी जरूरी हे,सभी को अपनी अपनी सुरक्षा करनी है। उन्होंने खानपान में शुद्धता के महत्व को दर्शाते हुये कहा कि वर्तमान में अभी तक इस वीमारी से बचने के लिये कोई भी वैक्सीन नहीं बनी है लेकिन खान पान की शुद्धता तुम्हारी सवसे बड़ी वैक्सीन है।यही तुम्हारे जीवन की ढाल है, जो भी आचार विचार और खान पान की नियम संयम की इस वैक्सीन अपनाएगा वह अपने जीवन की रक्षा कर सकेगा एवं स्वस्थ तथा प्रसन्न रहेगा। उन्होंने आज के सांची के प्रवास के संद्रभ में कहा कि सांची में बौद्ध और पुरातत्व का विशेष महत्व है, और ऐसे स्थान पर सांची की जैन समाज ने भगवान श्री शीतलनाथ स्वामी के मंदिर का निर्माण किया।वह सभी आशीर्वाद के पात्र है। उन्होंने कहा कि 20 साल पहले इस मंदिर के पंचकल्याणक आचार्य श्री आज्ञा से संपन्न कराये थे। उन्होंने याद करते हुये कहा कि प्रकाश जैन जिन्होंने मंदिर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमीका निभाई थी उनके परिवार को बहूत बहूत आशीर्वाद प्रदान किया।

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