Domain Registration ID: D414400000002908407-IN Editor - vinayak Ashok Jain (Luniya) 8109913008
Shobhit Jain August 22, 2019

विदिशा।संकटों में ही आदमी की परिक्षा होती हैं,संकट के उन क्षणों में जो अपने स्थाइत्व को बनाऐ रखता हैं एवं अन्यत्र कंही नही भटकता हैं वही तो एक सच्चा सम्यक् दृष्टी श्रावक हैं। पारिवारिक समस्याऐं या शारिरिक व्याधियाँ किसके जीवन में नहीं आती???
जब कोई ऐसी समस्याओं से या बाधाओं से ग्रसित हो जाता हैं, जिसका उसे कोई हल दिखाई नही देता है तो वह यंहा वंहा पर जाकर अपने उस दुःख को नहीं कहता बल्कि उसे अपने पूर्व उपार्जित कर्म मानकर एक सम्यक् दृष्टि श्रावक वीतरागी, सर्वज्ञ परमार्थभूत देव शास्त्र और गुरु की और मन लगाकर पूजा करता हैं, जिससे उसके पाप उपार्जित कर्म नष्ट होकर वह संकट टल जावे। उपरोक्त उद्गार आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज ने जैन भवन किरीमौहल्ला विदिशा में आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी रचित ग्रन्थ रत्नाकरंडक श्रावकाचार से अमूढदृष्टी अंग पर बोलते हुये प्रातःकालीन प्रवचन सभा मे कहे।
उन्होंने कहा कि धर्म की बातें तो हम लोग बहूत बड़ी बड़ी कर लेते हैं,लेकिन ध्यान रखना संकटों में ही आदमी की परिक्षा होती हैं। जब तक सब कुछ अच्छा चलता हैं, तब तो हम खूब धर्म के मर्म को समझते हैं, और तत्व की बात करते हैं, खूब पूजा पाठ में मन लगाते हैं लेकिन यदि कोई समस्या आई तो सबसे पहले धर्म से ही वंचित होता हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि यही एक टर्निंग पांइट हैं, इस टर्निंग पांइट पर यदी आपने अपने आपको सम्हाल लिया तो आपके सम्यक्त्व की रक्षा हो जाएगी, लेकिन देखा गया हैं कि अच्छे अच्छे तत्वपदेशक जब धर्म को भूलकर अन्यत्र कु तत्व की सेवाओं में लग जाते हैं, तो उनका यह अमूढदृष्टी दृष्टि अंग खंडित हो जाता हैं।
उन्होंने कहा कि संकट के इन अवसरों पर हमारी सोच होंनी चाहिये कि “हे जिनेश्वरआप ही मेरे रक्षक हो मुझे पाप कर्म से मुक्त करो।जब तक में पाप कर्म से मुक्त नही होंगा तब तक में इस दुःख दर्द से मुक्ती नही पा सकता”। ऐसा अकाट्य दृण श्रद्धान जिनका होता हैं,उनका संकट निश्चित करके टलता हैं।
उन्होंने कहा कभी कभार ऐसी भी बात सुनने में आती हैं कि फलाने स्थान पर जाने से उसके दुःख दर्द दूर हो गये? यह मात्र भ्रम हैं, वह दुःख दर्द वंहा जाने से नही मिटे बल्कि आपके पूर्व उपार्जित पुण्य कर्म के उदय से मिटे हैं, लेकिन हम मिथ्यात्व पर विश्वास करके जब उस मार्ग को और पुष्ट करते हैं, इस प्रकार से खोटे मार्ग का अनुशरण करने से मोहनीय कर्म के उदय से 70 कोड़ा कोड़ी सागर पर्यन्त तक यह दुःख भोगना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि अपने श्रद्धान को दृण रखें, कितना भी संकट आ जाएं! कितने भी दुःख आ जाऐं लेकिन में परमार्थभूत देव शास्त्र और गुरू के अलावा अन्यत्र कंही भी शरण में नही जाऊंगा देखना आपकी यही दृण आस्था और श्रद्धा फलीभूत होगी और आपके ऊपर आए हुये समस्त दुःख एवं संकट समाप्त हो जाएंगे।उपरोक्त जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन ने दी।

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