Domain Registration ID: D414400000002908407-IN Editor - vinayak Ashok Jain (Luniya) 8109913008
Shobhit Jain August 21, 2019

विदिशा से संभाग हेड शोभित जैन की रिपोर्ट


यह शरीर तो स्वभाव से अशुचिमय और अपवित्र मलमूत्र का पिटारा हैं, जिन्होंने इस अपवित्र शरीर से रत्नात्रय अर्थात सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र की साधना से पवित्र बनाया हैं, उनके प्रति श्रद्धा और भक्ती भाव रखना एवं उनके गुणों से प्रीती रखना ही निर्विचिकित्सा अंग कहलाता हैं, उपरोक्त उदगार आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज ने जैन भवन किरीमौहल्ला में आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी रचित रत्नाकरंडक श्रावकाचार ग्रन्थ की वांचना करते हुये प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि एक वीतराग दिगम्बर रुप मंगलमय रुप होता हैं, जिसने इस रूप से प्रीती की उनका जीवन संम्हल गया और जिन्होंने उनको देखकर घृणा की या मत्सर भाव रखे उनको जन्म जन्म तक इसकी यातनाएं भुगतना पड़ी।
उन्होंने इतिहास की घटनाओं को सुनाते हुये कहा कि कभी भी किसी भी दिगम्बर साधु के प्रति मात्सर्य भाव पैदा मत करना और न ही उनके प्रति कोई द्वैषभाव या भेदभाव कर निंदा के भाव रखना, ऐसे परिणाम रखने वालों को उसके परिणाम जन्म जन्म तक भोगना पड़ते हैं।
उन्होंने कहा कि यह रत्नात्रय धर्म उसी औदारिक शरीर में ही पैदा होता हैं, जिस शरीर के प्रति तुम ग्लानी का भाव ले आते हो,
उन्होंने कहा कि कमल का फूल कींचड़ में ही पैदा होता है,
जितना अनुराग आपको कमल से हैं, उतना अनुराग आपको कींचड़ से भी रखना होगा तभी आप उस कमल को प्राप्त कर पाओगे।
जो रत्नात्रयधारक साधू हैं, उनके मलिन शरीर को देखकर उनसे घृणा न कर उनकी यथायोग्य सेवा कर उनके गुणों के प्रति अनुरागी बनना ही निर्विचिकित्सा अंग हैं।
जिन्होंने मुनिओं के मलिन शरीर से घृणा की उनको उसका प्रतिफल भुगतना ही पड़ा हैं! इतिहास में घटित घटनाओं को सुनाते हुये उन्होंने एक घटना पर प्रकाश डालते हुये कहा कि एक रानी अपने महल की छत पर श्रंगार कर दर्पण में अपने आपको निहार रही थी तभी एक रत्नात्रय धारी मुनिराज का वंहा से निकलना हुआ, उनका मलिन शरीर जब दर्पण के सामने आया उस रानी के मन में उन मुनिराज के प्रति घृणा उत्पन्न हुई, जिससे उस रानी का ऐसा कर्म बंध हुआ कि जब उसके इस जीवन का अंत हुआ तो उसका जन्म त्रियंच पर्याय में गधी के रुप में हुआ एवं उसने बोझा ढोते हुये वह जन्म भोगा तदुपरांत उसको सूकरी के रुप में भोगना पड़ा। तपश्चात उसे कुत्ती की पर्याय मिली और इन सभी पर्यायों के पश्चात उसने एक घीवर के यंहा जाकर एक लड़की के रुप में जन्म लिया उसके शरीर से इतनी अधिक दुर्गंध आती थी कि उसका नाम ही दुर्गंधा हो गया। वह अपने जीवन से इतनी अधिक दुःखी थी कि कोई भी उसके पास नहीं जाता था।
एक बार उस रास्ते से एक दिगंबर मुनि का निकलना हुआ उस लड़की ने अपनी व्यथा को रोते हुये कहा कि हे मुनिराज मुझे यह डंड किन कारणों से मिल रहा हैं? तब उन मुनिराज ने अपने अवधिज्ञान के माध्यम से उसकी पूर्व पर्याय के बारे में बताते हुये उन घटना के बारे में बताया।
तव उस बिटिया को अपने द्वारा किये गये उन कर्मों से घृणा हुई एवं उसने उन मुनिराज के प्रति भक्ती भाव प्रगट कर उनसे प्राश्चित लिया एवं कालांतर में वही जीवने मुनिओं और रत्नात्रयधारी साधुओं की वंदना कर अपने जीवन का उद्धार कर मोक्ष मार्ग को प्रशस्त किया।
उन्होंने कहा कि एक वीतराग दिगम्बर रुप एक मंगलमय स्वरुप हैं, जिसने इस रूप से प्रीती की हैं उनका जीवन संम्हल गया, और जिन्होंने इनको देखकर घृणा की उनको जन्म जन्म तक यातनाएं भुगतना पड़ी।
उन्होंने कहा कि कभी भी वीतरागी दिगंम्बर साधु के प्रति मात्सर्य भाव पैदा मत करना और न ही उनके प्रति भेदभाव करना। कभी भी उनकी निंदा मत करना
जन्म जन्म तक उसके परिणाम भोगना पड़ते हैं।
उन्होंने कहा कि रत्नात्रय से प्रेम करना लेकिन रत्नात्रय धारिओं में कभी भेदभाव नहीं करना चाहिये
उन्होंने कहा कि यह रत्नात्रय धर्म उस औदारिक शरीर में ही पैदा होता हैं।
जैसे कींचड़ के स्पर्श से ही पैदा होता हैं जितना अनुराग आपको कमल से हैं तो आपको कींचड़ में जाना होगा।
मुनिओं के मलिन शरीर को देखकर उनसे घृणा न कर उनकी यथायोग्य सेवा कर उनके गुणों के प्रति अनुरागी वनें।
उपरोक्त जानकारी विदिशा से प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुये बताया कि इस अवसर पर प्रतिदिन बाहर से अतिथि गण पधारते हैं एवं प्रवचनों का लाभ लेते हैं। आज बांसवाड़ा राजस्थान से लालचंद़ अपने साथियों के साथ पधारे आचार्य श्री ने साधुओं के प्रति श्रद्धा और भक्ती रखने वालों को आशीर्वाद देते हुये सभी गुरु भक्तों को आशीर्वाद दिया। इस अवसर पर समाज द्वारा उनका अभिनंदन भी किया गया।

SD TV (JAIN TV)

SD TV (MOVIE & ENTERTAINMENT)

Leave a comment.

Your email address will not be published. Required fields are marked*