Domain Registration ID: D414400000002908407-IN Editor - vinayak Ashok Jain (Luniya) 8109913008

धन संपत्ति पाप का बीज रूप हैं:आचार्यश्री

विदिशा से संभाग हेड शोभित जैन की रिपोर्ट

एक कुत्ता सूखी हडडी को चबा रहा हैं,उसे उस हड्डी में रक्त का स्वाद आता हैं, उसे भ्रम हैं कि इस हडडी से ही उसे रक्त का स्वाद मिल रहा हैं, जबकि वह रक्त उस हडडी के चबाने से उसके जख्मी मसूड़ों से आ रहा हैं।
उसी प्रकार यह संसारी प्राणी हैं, अपनी सम्पदा को और और बड़ाता चला जा रहा हैं,
उस संपत्ती में ही सुख मान रहा हैं,
वह यह जानता हैं कि यह सुख स्थाई नही हैं, तात्कालिक उस कुत्ते की हडडी के चबाने वाला सुख हैं, अंततःतो इस सुख भोगने के उपरांत दुःख को ही भोगना हैं, फिर भी वह उससे अपने आपको अलग नही कर पाता हैं।
उपरोक्त उदगार आचार्य श्री उदार सागर जी महाराज ने किरीमौहल्ला स्थित जैन भवन में आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी रचित रत्नाकरंडक श्रावकाचार के निःकांक्षित अंग का वर्णन करते हुये कही।
उन्होंने कहा कि हम सभी जानते हैं कि धन संपत्ति पाप का बीज रूप हैं, जैसे जैसे वह धन संपत्ति का वृक्ष बड़ता हैं, हमारा अधिकांश समय उसके संरक्षण में ही नष्ट होता चला जाता हैं।
उन्होंने धन संपत्ती और परिवार का राग को आग का उदाहरण देते हुये कहा कि
जैसे जलती आग में हाथ डालने से वह मां उस बच्चे को मना करती हैं, लेकिन फिर भी बच्चा मां की बात को न समझ आंख बचाकर उसमें हाथ डाल देता हैं,
और कष्ट को पाता हैं, वह नन्हा बालक उस कष्ट को भूलता नही हैं, और वह फिर उस आग के पास नही जाता।
लेकिन यह जिनवाणी मां
आपको बार बार समझा रही हैं, कि
“ये इन्द़िय विषय दुखः के कारण भूत हैं” फिर भी यह जीव उससे अपनी चाहत को नही मिटा पा रहा हैं, हम जानते बूझते हुये भी उस आग में हाथ डालते हैं और हाथ जलाते है, उस जलन को महसूस भी कर रहे हैं,
उस नन्हे बालक ने मां की बात नही मानी और आग में हाथ डाल दिया उसकी दाह से वह तो सम्हल गया लेकिन हम सभी जो कि अपने आपको समझदार कहते हैं, फिर भी सम्हलते नही हैं।
उन्होंने कहा कि धर्माचरण का पालन करते हुये जब हम लोग यथार्थ रुप से सांसारिक सुख और आत्मीय सुख के विषय में जानचुके हैं, तो कम से कम इस और भले ही आगे न बड़ पाऐ लेकिन कम से कम इसके राग की आग से तो अपने आपको बचाने का पुरुषार्थ करें।
तभी आपका ज्ञान कार्यकारी होगा। लेकिन संसार में संसारी प्राणियों की चाहत कुछ ऐसी है,कि कुछ पाने की आकांक्षा में वह सब कुछ गंवा बैठता हैं। जैसे
एक बच्चा छोटा हैं, और उसके पास करोड़ों रूपयों की संपदा हैं, लेकिन वह बच्चा अभी नाबालिग हैं और परिवार जन जब अचानक समाप्त हो जाते हैं,तो उसके उदर पोषण हेतू एक सामाजिक व्यवस्था/ अथवा सरकारी व्यवस्था बना दी जाती हैं। और उसका लालन पालन चलता रहता हैं, लेकिन वही बच्चा जब बड़ा और समझदार हो जाता हैं, तो वह अपनी पूरी संपत्ती का मालिक बन जाता हैं, फिर वह उस सामाजिक संरक्षण अथवा सरकारी की आशा नही करता, बल्कि अपनी संपत्ति से धन उपार्जित कर अपने जीवन को आगे बड़ाता हैं। ठीक उसी प्रकार इन्द़िय विषय सुख उस नाबालिग बच्चे के समान हैं जो कि तात्कालिक हें, स्थाई नही हैं, अनजाने में आपने उस इन्द़िय विषय सुख को भोगा कोई बात नही, लेकिन जब आप अपने आत्मीय सुख उस अथाह संपत्ती को जान चुके हो जो आपके पास हैं, फिर भी उस सामाजिक या सरकारी सहायता की आकांक्षा रखना क्या उचित हैं?
भक्तामर सूत्र में आचार्य श्री मानतुंग स्वामी कहते हैं कि जिसने समुद्र का खारा पानी पिया हैं, यदि उसे क्षीर सागर का जल पीने को मिल जाता हैं, तो वह फिर समुद्र का खारा पानी पीने की आकांक्षा नही रखता,
उसी प्रकार हे भगवन् आपकी भक्ती से जिसे एक बार क्षीरसागर का जल( आत्मीय सुख) मिल गया हो फिर भी वह यदिसमुद्रिक जल( संसार सुख)की आकांक्षा रखता हो उस समान मूर्ख प्राणी और कोई दूसरा नही हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि
यह जीव सांसारिक सुख की चाहत में (आंतरिक संपत्ती) सब कुछ लुटा दिया करता हैं, वह जानता हैं कि मन की यह चाह उसकी कभी पूरी होंने वाली नही हैं, फिर भी कुछ की चाह उसको मिटने पर मजवूर करती हैं।
उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि संघस्थ मुनि श्री उपशांत सागर जी महाराज का सांसारिक जन्म दिन हैं,और इस अवसर पर समाज बंधुओं ने मिष्ठान वितरित कर उस मां के प्रति आभार माना जिन्होंने इस आध्यात्म कर्म योगी को जन्म दिया।

SD TV (JAIN TV)

SD TV (MOVIE & ENTERTAINMENT)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *