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Shobhit Jain August 14, 2019

विदिशा से संभाग हेड शोभित जैन की रिपोर्ट

असत्य जब बार बार कहा जाता हैं तो वह सत्य को भी भ्रमित कर देता हैं, उपरोक्त उदगार आचार्य श्री उदार सागर जी महाराज ने जैन भवन किरीमौहल्ला में व्यक्त किये। उन्होंने एक कथानक सुनाते हुये कसा कि एक व्यक्ती ने बकरी का बच्चा खरीद कर ले जा रहा था चार ठगों ने उस बच्चे को देखा तो उसको हथियाने की योजना बनाई वह चारों अलग अलग स्थानों पर खड़े हो गये।
उनमें से पहला ठग मिला और उसने उस व्यक्ती से कहा कि कितना सुंदर कुत्ते का बच्चा लेकर जा रहे हो…..वह व्यक्ती बोला अरे नही नही यह बकरी का बच्चा हैं,कुत्ते का बच्चा नहीं हैं आप गलत बात कह रहे हो वह थोडा़ और आगे बड़ता हैं एवं एक चौराहे पर उसे दूसरा ठग मिलता हैं और वह भी उस बकरी के बच्चे को कुत्ते का बच्चा कहता हैं तो उसके मन में संदेह  को उत्पन्न कर देता हैं, लेकिन वह उस बच्चे को लेकर गोदी में लेकर आगे बड़ता है तो  वंहा पर फिर तीसरा ठग मिल जाता हैं और वह भी वही बात कहते हूये कहता हें कि वाह आप कितना सुंदर कुत्ते का बच्चे को गोदी में ले जा रहेहैं, अव तो उस व्यक्ती के मन में भी संदेह उत्पन्न होता हैं, वह व्यक्ति विचार करता हैं कि कंही मेंने बकरी के स्थान पर कुत्ते का बच्चा ही तो नही खरीद लिया!
लेकिन फिर भी वह उस बकरी के  बच्चे को लेकर आगे बड़ता हैं, तो चौथा ठग मिल जाता हैं और वह भी उस बच्चे को कुत्ते का बच्चा कहकर जब संबोधित करता हैं तो अ व्यक्ती का संदेह विश्वास में बदल जाता हैं और वह उस बकरी के बच्चे को कुत्ते का बच्चा समझ कर वंही छोड़ कर चल देता हैं।और वह ठग उस बकरी के बच्चे को हथियाने में कामयाब हो जाते हैं।
आचार्य उदार सागर जी महाराज ने कहा की जो लोग धर्म को नही मानते वह लोग उसे असत्य साबित करने के लिये नाना प्रकार के उदाहरण देकर वह जन्म मरण और आत्मा परमात्मा को भी नही मानते
 खाओ पिओ मौज करो यह शरीर तो नष्ट होंना ही हैं।
 एवं वह पुनर्जन्म को भी नही मानते।
 उनकी बातों में आकर आजकल के युवा बहूत जल्दी प्रभावित हो जाते हैं, एवं भ्रमित होकर अपने धर्म पर संदेह उत्पन्न कर लेते हैं, और अंततः उस सत्य धर्म को छोड़ देते हैं।
निः शंकित अंग हमें यही सिखा रहा हैं कि जिनेन्द्र भगवन ने जो कुछ भी कहा हैं उन सूत्रों पर और  उनकी कही बात पर कभी भी संदेह मत मत करना।
अपने श्रद्धान को सदैव दृण बना कर रखना
 उन्होंने कहा कि धर्म ध्यान के क्षेत्र में आज्ञा विजय नाम का धर्म ध्यान हैं,
 जिसमें लोक अलोक, संसार और मोक्ष की व्याख्या की गई हैं।
उन्होंने प्रश्न किया कि क्या आत्मा दिखती हैं?
नही दिखती
जिस प्रकार आत्मा के परमाणू सूक्ष्म हें और वह हमें नजर नही आते लेकिन फिर भी हम उस बात पर विश्वास करते हैं,
क्यू कि आत्मा और परमात्मा दौनों हैं और दौनों का ही अस्तित्व हैं
 इस बात को हम इसलिये स्वीकारते हैं क्यू कि यह कथन जिनेन्द्र देव ने कहा हें उसी प्रकार इस ढाई दीप में बहूत सारे समुद्र हैं, पर्वत हें, कृतिम अकृतिम जिन चैत्यालय हैं,
हम और आप उन बातों पर इसलिये विश्वास करते हैं,
क्यों कि यह जिनेन्द्र भगवान की वाणी में आया हैं।
जैसे हमने राम और रावण का नाम सुना हैं, तिरेसठ सलाका पुरुषों का वर्णन आया हैं,
२४ तीर्थंकरों का वर्णन हैं
इन सभी को हमने देखा तो नही हैं, फिर भी हम उन सभी बातों को मानते हैं,उस पर विश्वास भी करते हें।
लेकिन यदि कोई कहे कि अरे ये आत्मा परमात्मा कुछ नही होते?
 ये सब तो इन साधू संतों की चाल हैं तो क्या आप उन पर विश्वास करते हैं?
उन्होंने कहा कि यह विज्ञान का युग हो ,जो न तो वर्तमान पर विश्वास करता हैं और न वह भूत और भविष्य को मानता हैं, फिर भी जव घटनाएं घटती हैं तो विज्ञान को भी आत्मा और परमात्मा को मानने पर मजवूर होंना ही पड़ता हैं।
जो लोग
खाओ पिओ मौज करो के सिद्दांत पर चलते है।
वह आत्मा परमात्मा जन्म मरण इन सभी वातों को नही मानते,
तो क्या आप उनकी इस वात पर विश्वास कर जिनेन्द्र भगवान द्वारा कहे गये शव्दों पर अविश्वास कर लोगे?
आचार्य श्री ने कहा कि निः शंकित अंग हमें धर्म के प्रति अकाट्य श्रद्धावान होंना सिखाता हैं
जो यह  कहता हैं कि चार वाग के सिद्धांत को सुनकर के या पड़कर के आप उन चार ठगों की वात पर विश्वास करके परमार्थभूत देव शास्त्र और गुरू द्वारा जो कहा गया हैं
उस सिद्धांत को मत छोड़ दैना।
उपरोक्त जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन ने विदिशा दी।

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