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सिंधिया का भाजपा में प्रवेश की खबर अफवाह हैं या प्रेशर पॉलिटिक्स,पर कांग्रेस के कारण सिंधिया के हाथ खाली

नेशनल डेवलपमेंट हेड अतुल जैन की रिपोर्ट

शिवपुरी। देश की राजनीति में इस समय सबसे बडी खबर हैं कश्मीर में धारा 370 का शिथिल करना,लेकिन मप्र की राजनीति में इस खबर के बाद सबसे बडी खबर हैं ग्वालियर राजघराने के महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने की खबर की। देश की सबसे बडी खबर धारा 370 के विरोध और समर्थन में से ही इस खबर का जन्म हुआ है। कुछ राजनीतिक विशेषज्ञो ने इसे अफवाह बताया और कुछ राजनीतिक विशेषज्ञो ने इसे सिंधिया की प्रेशर पॉलिक्टिस,लेकिन एक बात तय हैं कि कांग्रेस ने सिंधिया के हाथ खाली कर दिए हैं। आईऐ हम इस पूरे मामले का एक्सरे करते हैं।

जैसा कि विदित है देश की भाजपा की सरकार ने देश की राजनीति में बडा धमाका करते हुए कश्मीर को धारा 370 से मुक्त करते हुए इस राज्य के दो टूकडे करते हुए लददाख को अलग कर दिया। पूरे देश मे केन्द्र में सत्ता पर काबिज भाजपा सरकार के निर्णय हो सराहा गया,लेकिन विपक्ष में बैठी कांग्रेस सहित कई पार्टीयो ने इसका विरोध किया।

विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने इसका विरोध किया,कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी इसका विरोध किया। माना जा रहा था कि कांग्रेेस के सभी नेता अपने नेता के सुर में सुर मिलाऐंगें,लेकिन टीम राहुल के खास ओर कांग्रेस के युवा चेहरा पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कश्मीर से धारा 370 हटाने का समर्थन कर दिया।

इसके बाद राजनीतिक गणित शुरू हो गए। कुछ राजनीतिक पंडितो को कहना हैं कि यह कोरी आफवाह हैं,लेनिक कुछ राजनीतिक पंडितो का कहना हैं कि यह कोरी अपवाह नही हो सकती है यह प्रेशर पालिटिक्स का एक हिस्सा हो कसती हैं।

सिंधिया मप्र में कांग्रेस के ब्रांड हैं विधानसभा चुनावा में कांग्रेस ने सिंधिया के चेहरे को भुनाया लेकिन जब कुछ देने की बारी आई तो खाली हाथ ही रहे,सिंधिया की ताकत के ही कारण मप्र में कांग्रेस की सरकार बनी। इसका सबसे बडा उदाहरण था कि मप्र में विधाासभा के चुनाव के दौरान भाजपा ने सिंधिया को टारगेट करते हुए बस करो महाराज का मुद्दा प्रमुखता से उठाया था।

प्रदेश में कांग्रेस जब सत्ता में सरकार बनाने के गणित में आई तो आम प्रेदश वासी सिंधिया को सीएम बनना देखना चाहते थें। लेकिन मप्र की सीएम की कुर्सी कमलनाथ छिन ले गए। इसके बाद सिंधिया को मप्र कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने की मांग उठी लेकिन यहां भी सिंधिया के हाथ खाली रहे।

लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी को जिताने के लिए अपनी सीट को छोडकर दूसरी जगह मेहनत की लेकिन कांग्रेस तो हारी सिंधिया भी अपने वोटरो से संवाद नही पाना पाए ओर वे हार गए। सीधे—सीधे शब्दा में कहा जाए तो कांंग्रेस के कारण आज सिंधिया के हाथ पूरी तरह खाली हो गए।

सिंधिया की हार पूरे लोकसभा चुनाव की सबसे बडी खबर थी,कोई विश्वास नही कर सकता था कि सिंधिया अपनी सीट से चुनाव हार जाऐंगें। हालाकि इसके कई कारण हो सकते हैं,एक सबसे बडा कारण जो अब समझ में आया था वह था कांग्रेस पार्टी स्वयं,ओर अब यह सिद्ध् हुआ हैं सिधिया के धारा 370 के समर्थन पर।

भाजपा ने लोकसभा मेें सिर्फ राष्ट्रवाद के नाम पर चुनाव लडा था,पुलवामा हमले के बाद पकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राईक के बाद देश में राष्ट्रवाद की बयार में लोकसभा का चुनाव वह गया। कांग्रेस ने कभी ठोस राष्ट्रवाद की बात नही की। इस लोकसभा में कांग्रेस के पास कोई मुददा नही था। शायद अंदर ही अंदर कांग्रेसी भी यह मान चुके हैं कि राष्ट्रवाद का समर्थन नही करना भी कांग्रेस के कुलनष्ट का एक कारण हो सकता हैं।

अब ताजा उदाहरण ही सामने आ रहा हैं जो धारा 370 पिछले 7 दशको से एक अबूझ पहली थी,राष्ट्रहित में एक देश एक विधान का नारा उचित था,एक देश में दो झंडे कैसे हो सकते हैं इस देश के विकास और कश्मीर के विकास के लिए धारा 370 हटाना आवश्यक थी। पूरा देश इस निर्णय के स्वागत के लिए खडा था,कांग्रेस को पक्ष—विपक्ष की राजनीति से उपर उठकर देश हित में लिए गए निर्णय का स्वागत करना था। अपने आप को जिंदा रखने के लिए  देश की जनता के मूड के हिसाब से चलना हैं,लेकिन यहां भी कांग्रेस नही चली,इस कारण कांग्रेस को लोग सोशल पर कोस रहे थे।

सिंधिया के बयान से उठे कई गणित

यहां सिधिया ने अपनी हार का मंथन करते हुए,राष्ट्रवाद की इस बयार में बहना ही उचित समझा ओर अपने पार्टी के ऐजेंडे से बहार आते हुए कश्मीर से धारा 370 हटाने के निर्णय का समर्थन कर दिया। इस समर्थन पर बहस शुरू हो चुकी हैं।

भोपाल से प्रकाशित एक समाचार पत्र ने प्रकाशित किया हैं कि यह खबर चौकाने वाली हो सकती हैं कि भाजपा के दिल्ली स्थित उच्च पदाधिकारियो से ज्योतिरादित्य सिंधिया की पहले दौर की मुलाकाते हो चुकी हैं ओर वे किसी भी वक्त अपने 3 दर्जन से अधिक विधायको के साथ भाजपा में आमद दर्ज कर सकते हैं।

प्रकाशित खबर में लिखा गया हैं कि सिंधिया की लगतार मप्र में उपेक्षा की जा रही हैं। अंतिम आस कांगेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी की घोषणा के बाद टूट गई। अब पार्टी मे युवा चेहरो को तबज्जो नही दी जाऐगी। वैसे भी ग्वालियर सिंधिया राजघराने का भाजपा से गहरा नाता हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी कैलाशवासी राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने भाजपा को अपने खून पसीने से सींचा हैं,उनकी दोनो बुआ वसुंधरा राजे सिंधिया ओर यशोधरा राजे सिंधिया भाजपा में हैं। कश्मीर मुददे पर सिंधिया का अलग अंदाज इस बात की पुष्टि करता हैं।

कुल मिलाकर अपने राम का इस मामले में कहना हैं कि कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का कशमीर मामले में बयान आत्मचिंतन हो सकता हैं। शिवपुरी-गुना के वोटर आज भी सिंधिया को पंसद करते हैं। अब समय बदल गया हैं लोग अब सवाल करने लगे हैं। अगर देखा जाए तो कांग्रेस ने सिंधिया को कुछ नही दिया,बल्कि सिंधिया ने कांग्रेस को दिया ही दिया हैं। सिंधिया अभी भी बिना कांग्रेस के चुनाव जीत सकते हैं।

इस बार शिवपुरी-गुना लोकसभा सीट से सिंधिया चुनाव नही हारे,बल्कि कांग्रेस चुनाव हारी हैं,या यू कह लो की कांग्रेस के कारण ही सिंधिया चुनाव हारे हैं। कांग्रेस ने सिंधिया के हिसाब से कभी पद नही दिया,दिया है तो सिर्फ चुनावो बोझ,इस बयान को जो भी मतलब हो लेकिन एक बात तय हैं कि आज की स्थिती मेें कांग्रेस के कारण ही सिंधिया के हाथ खाली हैं। भाजपा में जाना-न जाना एक अलग विषय हैं।

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