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मोक्षमार्ग में श्रद्धा के साथ आचरण का होंना अनिवार्य हैं:आचार्य उदारसागर

विदिशा से संभाग हेड शोभित जैन की रिपोर्ट

मोक्षमार्ग में श्रद्धा के साथ आचरण का होंना अनिवार्य हैं। सम्यक् दर्शन के आठ अंगों का पालन हमारी चर्या में आना चाहिये तभी हमारा मोक्षमार्ग कल्याणकारी कहलाएगा उपरोक्त उदगार आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज ने रत्नाकरंडक श्रावकाचार का व्याख्यान करते हुये सम्यक् दर्शन के आठ अंग पर चर्चा करते हुये जैन भवन में प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि हम जाने पहचाने रास्तों पर तो खूब चलेहैं, लेकिन आज दिन तक मंजिल नही मिली!
मंजिल पाने के लिये जब किसी अनजानी राह पर चलना हैं, तो उस मार्ग के विषय में पूरी जानकारी लेकर ही आगे बड़ना उचित रहता हैं।
उन्होंने सम्यक् दर्शन के आठ अंग की चर्चा करते हुये कहा कि जैसे हमारे शरीर में आठ अंग हुआ करते हैं एवं सभी अंगों की कीमत हुआ करती हैं,
उसी प्रकार एक सम्यक् दृष्टि जीव सम्यक् दर्शन के सभी आठ अंगों का पालन करता हें, जिसमें सर्व प्रथम हें- निशंकित, निकांक्षित,निर्विचिकित्सा, अमूढदृष्टी, उपगूहन, स्थितीकरण,वातसल्य, और प्रभावना नाम के ये आठ अंग हैं, उन्होंने सम्यक् दर्शन के आठ अंगों की तुलना शरीर के आठ अंगों से करते हुये कहा कि
जैसे शरीर में आठ अंग हैं! दो हाथ दो पैर,पीठ, छाती, नितम्व, एवं मस्तक होते हैं एवं सभी अंगों का अपना महत्व हैं, उसी प्रकार एक सम्यक् दृष्टि जीव को देव शास्त्र और गुरू के प्रति श्रद्धा होते हुये भी आचरण का होंना अनिवार्य हैं। वह आचरण हमारी चर्या में आना चाहिये!
जैसे आप नि शंकित होकर आगे बड़ते हैं, तो दांया पैर निः शंकित होकर आगे बड़ता हैं, और जब दांया पैर आगे वड़ता हैं,तो बायां पैर बिना कोई आकांक्षा के पीछे रहकर स्वतः आगे बड़ जाता हैं।
उन्होंने कहा कि दांया पैर हमारे “निशंकित अंग” को प्रदर्शित करता हैं, जो कह रहा हें कि आगे बड़ना है तो शंका मत करो!
और वंही वांया पैर रहकर आगे बड़ रहा हैं जो कि निःकांक्षित अंग को बताता हैं, और कहता हैं कि मोक्ष मार्ग में आगे बड़ना हैं तो किसी से भी कोई आकांक्षा/आपेक्षा मत करो!
इसी प्रकार हम प्रातःकाल उठते हैं और शौचादि की क्रिया करने जाते हैं तो बिना किसी ग्लानी भाव से वांया हाथ आगे आ जाता हैं,जो हमें निर्विचिकित्सा अंग की और दृष्टि ले जा रहा हैं कि किसी भी धर्मात्मा से ग्लानी का भाव मत करो।
जब कोई हमारे ऊपर आकृमण करता हैं तो सुरक्षा का कार्य हमारा दांया हाथ करता हैं, जो कि सम्यक् दर्शन के स्थितीकरण अंग को प्रदर्शित करता हैं।
धर्मात्माओं की एवं सधर्मीओं की सुरक्षा में सदैव समर्पित भाव को रखना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि खोटी मान्यताओं के लिये हमेशा पीठ दिखाकर चलना चाहिये।
जो कि हमारे अमूढदृष्टी अंग को प्रदर्शित करता हैं।
इसी प्रकार नितम्व भाग को ढंक कर रखते हैं उसको दिखाने में लज्जा महसूस होती हैं,
उसी प्रकार यदि किसी धर्मात्मा जीव से यदि कोई त्रुटि आदि होती हैं तो उसको नितम्व अंग के समान ढंक कर रखना चाहिये! उन्होंने शरीर में हृदय के महत्व की चर्चा करते हुये कहा कि यह हमारे वातसल्य का प्रतीक हें साधर्मीओं और धर्मात्मा ओं के प्रति वातसल्य का भाव सदैव रहना चाहिये,
जैसे पूरे शरीर का राजा मस्तक कहलाता हैं।जिससे आदमी पद प्रतिष्ठा पाता हैं तो वह अपना मस्तक उठाकर चलता हैं। और उसकी प्रतिष्ठा और प्रभावना होती हैं।
उसी प्रकार प्रभावना अंग के लिये हमें ऐसे कार्य करना चाहिये जिससे जिन शासन की प्रभावना होती रहे।
उपरोक्त जानकारी देते हुये अविनाश जैन ने देते हुये बताया कि आचार्य श्री के प्रवचन प्रतिदिन जैन भवन किरीमौहल्ला विदिशा में ८:१५ से चल रहे हैं।

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