परमपूज्य आचार्यश्री विद्यानन्द और उनका साहित्यिक अवदान

भारतीय संत परम्परा में लक्ष्य की स्पष्टता, दिशा का निर्धारण और दिशादर्शक – इस त्रिपुटी का महत्वपूर्ण स्थान है । इन तीनों को पूर्ण रूप से सार्थक किया परम पूज्य राष्ट्रसंत सिद्धान्त चक्रवर्ती आचार्यरत्न श्री 108 विद्यानन्द जी महाराज ने । कर्नाटक के शेडवाल ग्राम में जन्में बालक सुरेन्द्र से लेकर महान् निर्ग्रंथ आचार्य श्री विद्यानन्द मुनिराज तक की उनकी असाधारण जीवन यात्रा भौतिकता पर आध्यात्मिकता की विजय की वह प्रेरक यात्रा है, जिस पर वे पाँच कम सौ वर्ष की आयु में भी अक्षुण्ण रूप से साधनारत रहे एवं यम सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण को प्राप्त किया ।

          सृजनात्मक दृष्टि, सकारात्मक चिंतन, स्वच्छ भाव, सर्वोत्तम साध्य, सघन श्रद्धा, शुभंकर संकल्प, शिवंकर शक्ति, सम्यक् पुरूषार्थ, श्रेयस अनुशासन, शुचि संयम, सतत् ज्ञानोपयोग – इन सबके सुललित समुच्चय का नाम है आचार्य श्री विद्यानंदजी मुनिराज । मुझे आपके दर्शनों का एवं शुभाशीर्वाद प्राप्त करने का अनेक बार सौभाग्य प्राप्त रहा है । दिल्ली स्थित कुन्दकुन्द भारती संस्थान में जब भी आपसे चर्चा होती, हमें अनेक नए तथ्यों का ज्ञान प्राप्त होता ।

          आपने बीसवीं एवं इक्कीसवीं शताब्दी को अपने विलक्षण व्यक्तित्व, अपरिमेय कर्तृत्व एवं क्रांतिकारी दृष्टिकोण से प्रभावित किया ।  आपकी दीर्घ संयम साधना जितनी प्रेरक है, उससे कम भी नहीं है आपके बहुमुखी अवदान । आपने जहाँ एक ओर जैन धर्म, साहित्य, समाज, संस्कृति और इतिहास के विकास के नए क्षितिज उन्मुक्त किए, वहीं दूसरी ओर जैनधर्म को जनधर्म बनाकर अभिनव धर्मक्रांति का सूत्रपात किया । आपने धर्म और संस्कृति को सार्वजनिक जीवन व्यवहार का अंग बनाने का श्लाघनीय प्रयत्न किया ।

          आपने अपना समस्त जीवन – धर्म और संस्कृति की प्रभावना, धर्म और राजनीति में समन्वय, साहित्य को जन-जन का कण्ठहार बनाने व अहिंसा, अनेकांत तथा अपरिग्रह के व्यावहारिक एवं प्रायोगिक स्वरूप को  समझने व समझाने में समर्पित किया । वे आचार्यरत्न श्री देशभूषणजी महाराज के परम शिष्य रहे और उन्हीं की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से कई कन्नड़ भाषा में लिखे हुए प्राचीन ग्रंथों का सरल हिन्दी व संस्कृत में अनुवाद किया  । आपके प्रभावक प्रवचनों को आलेखबद्ध कर अनेक छोटी-बड़ी पुस्तकें प्रकाशित हुईं । आपको प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषाओं से विशेष लगाव था, इसीलिए आपने अनेक विद्वानों द्वारा प्राकृत भाषा के प्राचीन, दुर्लभ किन्तु महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों  का सम्पादन, अनुवाद तथा प्रकाशन कराया । जैन साहित्य के विकास में आपका बहुमूल्य योगदान है । आपके उपलब्ध साहित्य के आधार पर हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि आप मात्र जैन साहित्य में ही नहीं  अपितु सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य में एक प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में प्रतिष्ठित हैं । आचार्य विद्यानन्द द्वारा रचित कुछ प्रमुख ग्रन्थों के नाम इस प्रकार हैं   :-

१.    पिच्छी कमण्डलु

२.    अपरिग्रह से भ्रष्टाचार उन्मूलन

३.    देव और पुरुषार्थ

४.    निर्मल आत्मा ही समयसार है

५.    भक्ति के अंगूर

६.    विश्वधर्म के मंगलपात

७.    समय का मूल्य

८.    अनेकान्त-सप्तभंगी-स्याद्वाद

९.    स्वतन्त्रता, समाजवाद और अनुशासन

१०.                      विश्वधर्म के दस लक्षण

११.                      सप्त व्यसन

१२.                      अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग

१३.                      नारी का स्थान और कर्तव्य

१४.                      आदि कृषि शिक्षक तीर्थंकर   आदिनाथ

१५.                      ईश्वर क्या और कहाँ ?

१६.                      पावन पर्व रक्षाबन्धन

१७.                      सुपुत्र कुलदीपक

१८.                      श्रमण संस्कृति और दीपावली

१९.                      धर्मनिरपेक्ष नहीं        सम्प्रदायनिरपेक्ष

२०.                      मोहनजोदड़ो – जैन परम्परा          और प्रमाण

२१.                      तीर्थंकर वर्धमान

२२.                      मंत्र, मूर्ति और स्वाध्याय

२३.                      वीर प्रभु

२४.                      सर्वोदय तीर्थ

२५.                      सोने का पिंजरा

२६.                      विश्वधर्म की रूपरेखा

२७.                      अहिंसा – विश्वधर्म

२८.                      जैन साहित्य में विकार

२९.                      आध्यात्मिक सूक्तियाँ

३०.                      पुरुदेव भक्ति गंगा

३१.                      महावीर भक्ति गंगा

३२.                      नेमीनाथ भक्ति गंगा

३३.                      मंगल कुमकुम पात

३४.                      अग्नि और जीवत्व शक्ति

३५.                      कल्याण मुनि और सम्राट सिकन्दर

३६.                      जैन संस्कृति में ज्ञान और पूजा

३७.                      महात्मा ईश

३८.                      गुरु परिवाद विचार

मंगल प्रवचनों का संग्रह :

३९.                      गुरुवाणी (पाँच भाग )

४०.                      मंगल प्रवचन

४१.                      अमृतवाणी

ये सभी ग्रंथ इतनी अधिक सरल, सुबोध शैली में लिखे गए हैं कि साधारण से साधारण व्यक्ति भी इन्हें पढ़कर के उस ग्रंथ के प्रतिपाद्य विषय को भी सहज ही समझ सकता है ।

          इस प्रकार हम देखते हैं कि आचार्य विद्यानन्द जी का जैन धर्म के साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों के विकास में बहुमूल्य योगदान है । आचार्यश्री स्वयं में एक विश्वविद्यालय रहे हैं । आपने अकेले ही सांस्कृतिक एवं साहित्यिक उन्नयन का जितना कार्य किया है, उतना अनेक संस्थाएं मिलकर भी शायद ही कर पाएँ । ऐसा प्रभावशाली और राष्ट्रीय विचारधारा से ओत-प्रोत उनका व्यक्तित्त्व उनको मौलिक रूप से राष्ट्रसंत के रूप में परिभाषित करता है । उनके व्यक्तित्त्व और कृतित्व से प्रभावित होकर काव्य के रूप में कुछ स्वरचित पंक्तियाँ उनके चरणों में अर्पित कर रहा हूँ –

                            जय हो राष्ट्रसंत

“तपोमूर्ति – प्राकृतपुरुष

क्षपकराज – निर्ग्रंथ

आगमवेत्ता – विचारक

साधक आचार्यरत्न

श्वेतपिच्छाचार्य दिगम्बर

वीतरागी राष्ट्रसंत

जय हो सिद्धान्त चक्रवर्ती

आचार्यश्री विद्यानंद

जय हो सिद्धान्त चक्रवर्ती

आचार्यश्री विद्यानंद

डॉ. अरिहंत कुमार जैन, मुम्बई

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