निराशा और अवसाद की चरम सीमा ही आत्महत्या है

सत्यम सिंह बघेल (आलेख)

सच्चा दोस्त न्यूज़  : वर्तमान दौर में अधिकांश लोग किसी न किसी वजह से तनाव से ग्रसित हैं। मानसिक विकार, आर्थिक परेशानी, प्रेम में नाकामी, असफल विवाह, पेशेवर जीवन का दबाव, बेरोजगारी, पढ़ाई-लिखाई में बेहतर प्रदर्शन करने, बेहतर संस्थानों में दाखिला लेने का दबाव और लोगों के अंदर कम होती जूझारू प्रवृत्ति जैसी अनेक वजह हैं जिनके कारण लोग तनाव युक्त जीवन जी रहे होते हैं और यह तनाव ही कई बार व्यक्ति को अवसाद से ग्रसित बना देता है जो आत्महत्या की वजह बन जाता है। किताबों से दूर रहने के कारण भी अब हमारी रचनात्मकता दम तोड़ रही हैं,  जिससे तनाव सहने की क्षमता कम हो रही। पैसा और शोहरत पाने की होड़ में जीवन की कई महत्वपूर्ण चीजें छूटती जा रही हैं, आधुनिकता की अंधाधुंध दौड़ और पश्चिमी सभ्यता की दुहाई देने वाले भूल जाते हैं कि जड़ों से टूटकर जिंदगी से जुड़े रह पाना बिल्कुल सम्भव नही है। ऐसी कामयाबियां बेमानी हैं जिनमें जिंदा रहने का मकसद ही हवन हो जाए।
शहरी क्षेत्र हो या गांव ऐसी घटनाएं अब आम होती जा रही हैं। लोगों में तनाव सहने की क्षमता घट चुकी है, जो बेहद चिंताजनक विषय है। आत्महत्या करने वाले ज्यादातर किशोरावस्था के होते हैं। इस समय उनमें सोचने-समझने की दक्षता पर्याप्त नहीं होती, मानसिक रूप से वे पूरी तरह परिपक्व नहीं होते। कभी सिर्फ बड़ी उम्र के लोगों को होने वाला डिप्रेशन अब तेजी से स्कूल जाने वाले बच्चों को अपना आसान शिकार बना रहा है। परीक्षा के समय छात्र-छात्राओं द्वारा मौत को गले लगाने की घटनाएं आम बात हो गई है। 
आधुनिकता के शीर्ष पर बैठे लोगों का व्यवहार, अब समाज द्वारा अर्जित संस्कार और परंपरा नहीं, बल्कि टीवी, सिनेमा द्वारा नियंत्रित होता है और यही वजह है कि परंपरागत पालन-पोषण से दूर होने के कारण बच्चे छोटी उम्र से ही स्व-केंद्रित होते जा रहे हैं। कामकाजी माता-पिता अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं। धीरे-धीरे बच्चा अपने माता-पिता से सारी बातें छिपाने लगता है। हम देखते हैं कि बच्चों का अपने माता-पिता से संबंधों में खुलापन का अभाव दिखाई पड़ रहा है, जो आगे चलकर बड़ी परेशानी का रुप ले लेता है। 
आत्महत्या करने वाले ज्यादातर बच्चे डिप्रेशन, खासकर सायकोटिक डिप्रेशन का शिकार होते हैं।एक शोध के नतीजे बताते हैं कि बच्चों में तेजी से बढ़ रही आत्महत्या की घटनाओं के पीछे सबसे बड़ी वजह यही डिप्रेशन है। अहम बात यह है कि बच्चों में डिप्रेशन के कारण बहुत ही छोटे-छोटे होते हैं, जिन्हें अभिभावक और समाज समझ नहीं पाते, जबकि बच्चों में 80 प्रतिशत आत्महत्याएं पूर्व संकेत के बाद ही होती हैं। कुछ ही खुदखुशी क्षणिक आवेग में होती हैं। उनके मन में हर समय एक तरह का अपराधबोध मौजूद होता है। सबसे ज्यादा वे इस बात से दुखी होते हैं कि अपने माता-पिता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं। किसी भी गलत काम या दुखद घटना के लिए भी बच्चे कई बार खुद को दोषी मान लेते हैं और अवसादग्रस्त हो जाते हैं।विडम्बना यह है कि जो मां-बाप उन्हें दुनिया में लाते हैं प्राय: उन्हीं की महत्वाकांक्षाओं का दबाव उनकी जान ले लेता है। 
सिर्फ छात्र-छात्राएं या बच्चे ही नहीं आम लोग भी आत्महत्या कर रहे हैं। छोटी-छोटी बातों व तनाव को लेकर लोग सीधे जीवन को ही समाप्त करने का मन बना रहे हैं। हम किसी की आत्महत्या की खबर पढ़कर दुखी होते हैं या आश्चर्य जताकर भूल जाते हैं। लेकिन क्या किसी ने सोचा है ? आत्महत्या के आंकड़े दिन पर दिन क्यों बढ़ रहें है। इसकी मुख्य वजह क्या है ? यह जानना, समझना बेहद जरूरी है । किसी एक व्यक्ति की आत्महत्या केवल उनका मामला नही है बल्कि यह एक समाज का गंभीर विषय है। क्योंकि हमारे देश में किसी न किसी वजह से हर दिन न जाने कितने लोग आत्महत्या कर गुमनाम हो जाते हैं। आत्महत्या करने वालों के जीवन और उनकी कहानियों का जिक्र और क्या हुआ, कैसे हुआ आदि का तबसरा तो तमाम समाज लगातार करता ही है, लेकिन यह कोई नहीं कहता कि संस्कारों से भटकर नकारात्मकता को गले लगाने का परिणाम कितना बुरा होता है। 
बदलते सामाजिक एवं पेशेवर मूल्यों और टूटते संयुक्त परिवारों की वजह से पारंपरिक सहयोग प्रणाली खत्म हो रही है तथा मैत्रीपूर्ण संबंधों और विश्वासों में कमी आ चुकी है। हमारी परेशानी सुनकर सामने वाला कैसी प्रतिक्रिया देगा? इसका भय हमें सताता है साथ ही एक-दूसरे के साथ ‘आपसी सामंजस्य की कमी’ भी बढ़ रही है और यही वजह है कि व्यक्ति अपनी परेशानी किसी से साझा करने में हिचकिचाता है तथा इस तनाव या दबाव के दौर में उसे नैतिक, मानसिक या आर्थिक समर्थन नहीं मिल पाता जो पहले संयुक्त परिवारों में मिलता था। ऐसे समय अकेले पन में जी रहे लोगो के साथ जाम टकराने वाले तो मिल जाएंगे, चौंधियाती रातों के ढलने तक फरेबी कहकहे लगाने वाले भी मिल जाएंगे, किन्तु नहीं मिलेगा तो कोई एक ऐसा अपना जो सचमुच अपना होता, जिससे मन की बात कही जा सकती। चकाचौंध वाली मानसिकता लोगों को बिंदास तो बना देती है, लेकिन इतना तन्हा भी कर देती है कि दर्द बांटने को एक कंधा भी नही मिलता। यही वजह रहती हैं कि लोग तनाव में रहने लगते हैं, तनाव की वजह से अवसाद में ग्रसित होने पर व्यक्ति को एक मात्र रास्ता दिखाई देने लगता है सिर्फ आत्महत्या का और लोग उसे चुनने पर मजबूर हो जाते हैं।
आत्महत्या, निराशा और अवसाद की चरम सीमा होती है, जिससे बचने के लिए जरूरी है कि बच्चों को डिप्रेशन से बचाया जाए। वैसे निराशा, अवसाद की यह प्रवत्ति सिर्फ बच्चों में ही नही बल्कि बुजुर्ग, युवा, जवान, महिला, अमीर, गरीब सभी ग्रसित हैं। आज हर वर्ग, हर उम्र के लोग आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला को समाप्त कर रहे हैं। आखिर क्यों आत्महत्या की घटनाएं दिन पर दिन बढ़ रहीं हैं, क्यों लोग अवसाद से ग्रसित हो रहे हैं ? क्यों लोगों में तनाव सहने की क्षमता कम हो रही है ? इसे रोकने के लिए इसकी मुख्य वजह पर गौर किया जाये तथा हमारी शिक्षा व्यवस्था में उन बातों को प्रमुखता से बताया जाये, जिनकी जानकारी देना अतिआवश्यक है। जैसे जीवन से प्रेम करना, संघर्षशील लोगों का उदाहरण देना, दुख मे खुद को किस तरह संभाल कर रखें, संघर्ष में खुद को कैसे प्रेरित करें, खुश रहने के तरीके, नकारात्मक सोच से बचने की कोशिश करना, हमेशा सकारात्मक बने रहने और लोगों अंदर आत्मविश्वास बढ़ाया जाए, खुद पर विश्वास करना परिस्थिति का मुकाबला करना सिखाया जाए। सकारात्मकता के फायदे के बारे में बताया जाये, किसी भी काम मे धैर्य और साहस रखने के बारे में एवं इस तरह से लोगों में सकारात्मक जीवन जीने की प्रेरणादायक बातें बताना बहुत आवश्यक है।

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