50 हजार का बिल देख पंचायत खुद ही बिजली बनाने लगी, अब सोलर और पवन ऊर्जा से बिजली बना बेचकर 19 लाख कमा रही पंचायत

तमिलनाडु / ओड़नथुरई देश की सबसे आत्मनिर्भर पंचायत; दिन में सोलर, रात में पवन ऊर्जा से बिजली मिल रही
देशभर के सरकारी अफसर और 43 देशों के छात्र गांव देखने आ चुके हैं
गांव की झोपड़ियां पक्के घरों में बदलीं, हर 100 मीटर पर पीने के पानी की व्यवस्था है और हर घर में शौचालय भी

ओड़नथुरई : कोयम्बटूर से 40 किमी दूर ओड़नथुरई पंचायत के आत्मनिर्भर बनने की कहानी अनोखी है। यहां के 11 गांवों में हरेक घर पक्का है। छत पर सोलर पैनल लगे हैं। कॉन्क्रीट से बनी सड़कें हैं। हर 100 मीटर पर पीने के पानी की व्यवस्था है और हर घर में शौचालय भी है। ओड़नथुरई ग्राम पंचायत न सिर्फ अपनी जरूरत की बिजली खुद बनाती है, बल्कि उसे तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (टीएनईबी) को बेचती भी है। इससे सालाना 19 लाख रुपए की कमाई होती है।
ऐसा करने वाली यह देश की एकमात्र पंचायत है। सभी घरों में बिजली मुफ्त है। इन्हीं खूबियों के कारण विश्व बैंक के विशेषज्ञ, देशभर के सरकारी अफसर और 43 देशों के छात्र गांव देखने आ चुके हैं। बदलाव की यह कहानी 23 साल पहले शुरू हुई थी। तब छोटी-छोटी झोपड़ियों वाले गांव गरीबी और असुविधाओं में फंसे थे।
आर. षणमुगम इस बदलाव के प्रणेता
1996 में ग्राम प्रमुख रहे आर. षणमुगम इस बदलाव के प्रणेता बने। वे बताते हैं- ‘उस वक्त हर महीने पंचायत का बिजली बिल 2000 रुपए आता था। अगले एक साल में पंचायत में कुएं बनवाए, स्ट्रीट लाइट लगवाई, तो यह बिल 50 हजार रुपए पहुंच गया, जिसने चिंता बढ़ा दी। इस बीच, पता चला कि बायोगैस प्लांट से बिजली बन सकती है। तब बड़ौदा जाकर इसकी ट्रेनिंग ली।
2003 में पहला गैस प्लांट लगवाया। नतीजतन बिजली बिल आधा रह गया। फिर दो गांवों में सौर ऊर्जा से चलने वाली स्ट्रीट लाइट्स लगवाईं।’ 2006 में षणमुगम को पवनचक्की लगाने का विचार आया, लेकिन पंचायत के पास सिर्फ 40 लाख रुपए का रिजर्व फंड था, जबकि पवनचक्की टरबाइन 1.55 करोड़ रुपए की थी। षणमुगम ने पंचायत के नाम पर बैंक से लोन लेकर ओड़नथुरई से 110 किमी दूर 350 किलोवॉट की पवनचक्की लगवाई। इसकी मदद से पूरा गांव बिजली के मामले में आत्मनिर्भर हो गया, लेकिन पंचायत के शेष 10 गांवों केे लोग अब भी राज्य बिजली बोर्ड पर निर्भर थे।
तब षणमुगम ने एकीकृत सौर और पवन ऊर्जा प्रणाली अपनाई। हर घर की छत पर सोलर पैनल लगाए गए। घरों में दिन में बिजली सोलर पैनल से मिलती है और रात में पवनचक्की से। बैंक से लिया लोन पंचायत ने 7 साल में चुका दिया। अब सालाना 7 लाख यूनिट बिजली बन रही है। जरूरत 4.5 लाख यूनिट में पूरी हो जाती है। बची 2.5 लाख यूनिट टीएनईबी को 3 रुपए प्रति यूनिट पर बेच दी जाती है। बिजली में आत्मनिर्भर होने पर गांव की तरक्की के और रास्ते भी खुल गए हैं।बिजली बनाने से अंधेरा दूर, जीवन भी रोशन
आज पंचायत बिजली बिक्री से लगभग 19 लाख रु. सालाना कमाती है। यह राशि 11 गांवों के विकास में खर्च होती है। राज्य सरकार की सोलर पावर्ड ग्रीन हाउस स्कीम के तहत 950 घर बनाए गए हैं। ढाई-ढाई लाख रुपए की लागत से ये घर 300 वर्ग फीट क्षेत्र में बने हैं।

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