विकास कि स्थान पर हिन्दू – मुस्लिम पर केन्द्रीत होगा लोकसभा 2019


जाति- मज़हब में उलझकर रह गई विकास कि रेल


सम्पादकीय । ऐसे तो हमारे देश मे यह पहला मौका नही है जब विकास का ढ़ोल पिटने वाले नेता चुनाव आते ही जाति और मज़हब कि राजनीति को हवा दे सत्ता पर आसीन हो जाते है। इस बात का तो इतिहास गवाह है कि जब-जब देश में कहीं भी चुनाव हुए है तब-तब राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टी हो या क्षेत्रिय अपना – अपना वोट बैंक को प्रलोभित कर चुनावी मैदान पर कूद पढ़ती है। जिनमें भाजपा कि एनडीए – कांग्रेस की यूपीए समेत देश कि तमाम राजनैतिक पार्टीया है जो हिन्दू – मुस्लिम- दलित को बोट बैंक कि तरह उपयोग करते है। किन्तु वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से मतदाताओं ने यह स्पष्ट कर दिया था कि हम जातिगत मतदान का हिस्सा नही बनेंगे। जिसका ताजा उदाहरण वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा कि एनडीए को 336 सीट पर विजयी बनाया। वही हम बात करें उसके बाद होने वाले चुनावों में बिहार को छोडकर तो हर राज्य में जातिगत मतदान के जगह कार्य और विकास को आधार बनाकर मतदाताओं ने मतदान किया जिसमें लोकसभा में जाने का मुख्य मार्ग कहलाने वाले यूपी भी शामिल रही। जातिगत मतदान से उभरकर विकासशील मतदान के लिए प्रेरित हुई मतदाता के पिछे मुख्य कारण रहा भाजपा – एनडीए गठबंधन के प्रधानमंत्री दावेदार रहे नरेन्द्र मोदी और उनके चुनावी नारे ‘‘अच्छे दिन आने वाले है’’।
देश में अब तक भाजपा हिन्दूवादी छवी वाली पार्टी हुआ करती थी तो वहीं कांग्रेस को मुस्लिम समर्थक पार्टी के रूप मे देखा जाता था। किन्तु गत वर्ष गुजरात विधानसभा चुनाव से कांग्रेस मुस्लिम समर्थक पार्टी होने के साथ ही हिन्दूवाद के मुद्दे पर भी सक्रिय होते नजर आई है। वहीं छत्तीसगढ़ में खासे बहुमत से तो राजस्थान में भाजपा से 26 सीट पर आगे रही कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में भी 5 सीटों में बाजी मारी। यह वह तीन राज्य है जो कि भाजपा शासित राज्य थे जिन राज्यों में 2014 के लोकसभा चुनाव में सीट भाजपा को सबसे ज्यादा समर्थन मिला था। इन सीटों पर कांग्रेस किसान हितौषी पार्टी बनने के साथ ही हिन्दूवाद छवी को भी चमकाई है। जिसके बाद से देश भर में सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने हिन्दू – मुस्लिम राजनीति को रंग देना प्रारंभ कर दिया। तो वही राजनैतिक पार्टीयां भी आप चुनावों में आम जनता के विकास पर केन्द्रीत दर्द को दरकिनार कर वोट बैंक को लुभाने मे लग गई है। जहां कांग्रेस ने तय कर लिया है कि वह सिर्फ किसानी मुद्दों पर चुनाव लडेगी तो वही परिवर्तन और विकास के नाम पर सत्ता में काबिज हुई भाजपा ने भी एक तरफ तो जातिगत मतदाताओं को लुभाना शुरू किया है (यह बात एसटीएससी एक्ट एवं उससे नाराज होकर सरकार के विरोध में जनतंत्र को एकत्र कर सामान्य वोट को नुकसान पंहुचाने वाले स्वर्णों को भी लुभाने के लिए 10 फिसदी आर्थिक आरक्षण के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है) तो वहीं चुनाव के नजदीक आते ही सरकार राम मंदीर के मुद्दे पर काफि हद तक सक्रिय नजर आ रही है। साथ ही यह कहना गलत नही होगा कि लोकसभा से लेकर विभिन्न राज्यों के मुस्लिम महिलाओं ने जो सरकार बनाने में निर्णायक मतदाताओं कि भूमिका निभाया है सरकार सत्ता में आते ही उनके लिए भी तीन तलाक के मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाते हुए 2019 लोकसभा में भी अपने पाले से जाने नही देना चाहती है। अब देखना यह है कि लोकसभा चुनाव के शेष बचे दिनों में सरकार और कौन कौन से लुभावने योजना का तोहफा आम जनता को भेट करती है जिसमें जीएसटी से लेकर अन्य योजनाओं में राहत और महंगाई कि मार से जीवनदान कि योजनए शामिल हो सकती है….. किन्तु वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा लग रहा है कि ‘‘जाति- मज़हब में उलझकर रह गई विकास कि रेल’’ विकास कि स्थान पर हिन्दू – मुस्लिम
पर केन्द्रीत होगा लोकसभा 2019।

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